SOOKOON-E-ROOH

kuch pal sookoon ke…

‘‘मेरी कविता-मेरी हमदम मेरी हमसफर’’

मन के किसी छोटे कोने मे बसे गावँ सी होती है मेरी कविता
पुराने किसी बरगद के पेङ की छावँ सी होती है मेरी कविता
मन दुखी हो तो माँ के आँचल सा प्यार देती है
बेसहारा ,बेचारा भावो को कागज पर उतार देती है
मै मन से और मेरा मन मुझ से जाने कितनी बातें करते है
दोनों मिल कर फिर सारी दूनियाँ मे घूमा करते है
कहीं कहीं इकठ्ठे दोनों अटक से जाते है
कुछ शब्द खोजते है,कोई लय नई बनाते है
फिर अपनी हमसफर लेखनी को बुलवाते है
उसे समझाते है कि दरअसल हम कहना क्या चाहते है
लेखनी चुपके से कोरे कागज के कान में कुछ कहती है
और कब से कोरे पङे उस कागज का मोल ही बदल देती है
पर सारी बातें भी कागज को कहाँ बता पाते है
कितने राज तो वहीं कहीं कविता के पास ही दफन हो जाते है
आसूँ कहीं जो किसी अक्षर पर गिर जाते है
दाग कागज पर भले ही रह जाए पर दिल से तो धुल ही जाते है
मेरी कविता में जीता रहता है बस आमजन
परत दर परत उघङता रहता है मानस मन
कहाँ मेरे बस का रहा अब ये आवारापन
जाने किस मोङ पर ले जा छोङेगा ये बंजारापन
मेरी तो पुराने गहनो सी पोटली में बधी रखी है
मेरी तो सबसे प्यारी ,राजदार सी ये सखी है
कुछ आसुओं के नग ,कुछ मुस्कान के मोती थोङी चाँदी सी हँसी
जब भी खोलु होठों पे दे जाती है इक अनकही सी खुशी
मेरी तरह तुम भी इन्हें बस लुत्फ उठाने के लिए पढो
मेरे भावो से समझो या अपने नये भावो में गढो
ठंडी ब्यार सी है ये दिल को छू कर जाऐगी
मेरी तो महकाई है आपकी भी जिदगीं महकाएगी
उदास रातों में कहीं जुगनु सी टिमटिमाएगी
मेरी कविता ही नही मेरा भरोसा भी हैं ये
कहीं भटकनें जो लगी तो रास्ता दिखाएगी !

November 15, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

“मेरी बगिया में महकते रिश्ते”

आज एक लेख पढ कर
रिश्तो को एक नये रुप मे देखा
अपने घर के पिछवाडे़
अपनी बगिया मे जो कदम रखा
तो और दिनो से बिल्कुल अलग था
वो सफेद गुलदावरी का पॉधा
वो मेरा बेटा है
बहुत ही प्यारा फूलो से लक-दक
उससे नजरे हटती ही नही
पूरी बगिया में सबसे पहले नजरे उसी पर टिकती है
उसके साईज को ले कर मैं हमेशा सोचती हूँ
कि ये और बडा, और बडा हो जाए तो
ज्यादा अच्छा लगे
वो दूसरे कोने में लगा मुस्कुराता सा लाल गुलाब
वो मेरे पति है
इन्हीं से ये बगिया रोशन है
बगिया के सारे फूलों के रंगो को अपने मे समाहित रखते हैं
फिर भी अपनी एक अलग पहचान, मुस्कान और शान रखते हैं
वो सचमुच राजा हैं इस बगिया के
बगिया में छोटे पौधौं और फूलों के बीच
बडी ही माकूल जगह एक शीशम का पेड खडा है
उसे पता है बगिया में कब कितनी धूप और कितनी छावँ वाछिँत है
वो सासू माँ है
बिल्कूल तटस्थ एकदम मुस्तैद
कभी-कभी लगता है जब सब सो जाते है
तब ये पेड ही सब पर नजर रखता है
सबके खाद पानी पर निगरानी रखता है
और सबको बस अपनी नजरों से
ही व्यवहारिक ज्ञान सिखाता रहता है
ये जो नरम मुलायम घास है ना
ये हमारा कुता जानी है
हर वक्त आमत्रण सा निहीत है इसमें
आओ मेरे साथ खेलो
लोटपोट हो जाओ मुझमें
भूल जाओ सारे तनाव
अपनी सारी परेशानियाँ समा जाने दो मुझ में
बस दो घडी, आओ मेरे पास आओ
और ये जो हरी पतियों और सफेद फूलों वाला चाँदनी का पेड है ना
ये मैं हूँ
हाँ, इस घर की, बगिया की
चाँदनी सी मैं, पूनम परिणिता
कहते है ना कि सफेद रंग से ही सारे रंग बनते है
बिल्कूल सच है
बीच-बीच में बगिया मे मेहमानों से
मौसमी फूल पौधे आते जाते रहते है
छोड जाते हैं अपनी मुस्कान, अपने रंग
अब ये हम पर होता है कि
हम उनसे क्या सीखते हैं
आप भी आज जब अपनी बगिया में जाऐगें
अपने पौधौ को देख कर प्यार से मुस्कुराऐगें
तब
देखते ही देखते फूल सारे रिश्तों में बदल जाऐगे

November 15, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

‘‘विरह—THE OLD LOVE STORY’’

एक थी दादी एक थे दादा
भोली थी दादी कङक थे दादा ।
दादी हरदम काम थी करती
दादा हरदम हुक्का पीते
दादी सबको प्यार थी करती
हङकाते रहते थे दादा ।
जाने क्युँ दादी को दादा कभी प्यार से ना बोलते थे
कङक माँङ का साफा लगाते, बस अपनी अकङ मे डोलते थे ।
गज भर घुंघट मे लिपटी दादी, सबका ध्यान वो रखती थी
नाती, पोते, बकरी, गैया सबका पेट वो भरती थी
बार बार दादी को दादा आवाज लगाते रहते थे
गलती हो किसी की भी पर उन्हे सुनाते रहते थे ।
छोटे से कद की सलोनी सी दादी
दादा लम्बे चौङे थे ।
बङी बङी मूछे थी उनकी
बाल मगर कुछ थोङे थे ।
सबको खिला कर दादी सबसे बाद में खाया करती थी
दादा की तो एक आवाज़ से सोते उठ जाया करती थी ।
दादा कभी बीमार जो होते दादी चिंतित हो जाती थी
लाख कहो पर दादी एक कौर ना खाती थी ।
दादी कहती दादा से……
कुछ ध्यान अपना भी किया करो
मीठा और घी कुछ कम कर दो
हुक्का ज्यादा ना पिया करो ।
हर सुबह वो पूजा करती, सारे करती व्रत त्योहार
उनका बस चलता तो दादा पर करती कई जन्म न्योछार ।
दादी सुनाती बहुओं को, कैसे हुआ था दादा से ब्याह
बङी शान से कहती कि, और कौन कर पाता इनसे निबाह ।
दादा हुए बीमार जो इक बार, तो दादी ने दिन रात एक किया
मन से सेवा में लगी रही, अपने तन का ना ध्यान किया ।
डरती रहती थी दादी, दादा को कुछ ना हो जाए
इनका ख्याल रखना प्रभू, दिन रात ये माला वो फिराये ।
दादा हो गए ठीक, तो दादी ने प्रसाद चढ़ाया था
इतनी भाग दौङ से हल्का दादी को बुखार चढ़ आया था ।
उस शाम बेटे बहुओं और सब बच्चो को बुलवाया था
जाने दादी को हुआ क्या, बस एक फरमान सुनाया था ।
सुनो छोटी सी बात मेरी
ना चाहती तुमसे कुछ ज्यादा,
दादा का ख्याल सब रखोगे,
बस करो मुझसे तुम ये वादा ।
बस इतना कहा दादी ने और उनकी आँखें हौले से बन्द हुई
बस बचा बाकी शरीर उनका, आत्मा तो उनकी स्वछन्द हुई ।

और उसके बाद से दादा को किसी ने हङकाते नही देखा
मीठा, घी सब कर दिया बंद, हुक्का गुङगुङाते नही देखा
वो दादा हरदम जो मूछों को ऐठे फिरते थे
अब जाने क्युँ हर वक्त वो बेचारे से दिखते थे
आँखें कुछ ना कहती उनकी,
पर मन भरा भरा सा रहता था
कोई दादी का नाम ना ले दे कहीं,
यूँ डरा डरा सा रहता था ।
दो दिन यूँ ही बस निकल गए….
तीसरा दिन जब चढ़ आया
दादा ने भी सबको तब अपने पास था बुलवाया
आओ बच्चो तुम सबको मैं
आखिरी बात बताता हूँ
दादी वहाँ अकेली होगी
सो मैं जल्दी से जाता हूँ ।
बस इतना कहा दादा ने और उनकी आँखें हौले से बन्द हुई
बस बचा बाकी शरीर उनका आत्मा तो उनकी भी स्वछन्द हुई ।
ये पुरानी प्रेम कहानी थी
बस ये इसका अन्जाम था
जाने जन्मों का बंधन था, प्यार था
कि विरह इसका नाम था ।

November 15, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

‘‘वो पीला वाला गुब्बारा…’’

नहीं वो नहीं भईया
वो नीले वाले के पीछे
वो, हाँ वो, बङा सा पीला वाला गुब्बारा
वो ही चाहिए मुझे ।
नहीं, नया फुला कर नहीं देना
बस वही वाला चाहिए
वो बङा सा पीला वाला गुब्बारा ।
ना, रंग बिरंगा नहीं
बस वही, हाँ बस वही….

आज इस उम्र में भी
मेरे अन्दर इक बच्चा
यूँ ही ज़िद करता है
बस मचल-2 उठता है
ना वक़्त देखता है
ना मेरी उम्र
ना हालात
वो तो ये भी नहीं देखता कि
कहीं कोई गुब्बारे वाला नहीं है
और ना ही कहीं कोई पीला वाला गुब्बारा…..

November 6, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

‘‘अभी तो ज़िन्दगी के बहुत दिन पङे हैं।’’

आज रात अजीब एक सपना आया…
किसी ने बताया कि आज का दिन आखिरी है….
मेरी ज़िन्दगी का ।
हङबङा कर उठी मैं, शान्त किया अपने मन को,
फिर याद किया अपने स्वप्न को,
क्या सचमुच आज, सिर्फ आज…
कितने काम बाक़ी हैं ज़िन्दगी के, और दिन बस…
हे भगवान कहाँ से शुरु करुँ……
कल जब माँ का फोन आया,
तो बीच में ही कट गया,
दोबारा मिलाने की जहमत ही नहीं उठाई,
सोचा सारी बातें वही तो है रटी-रटाई,
जल्दी से माँ को फोन मिलाऊँ,
आज का अपना सपना बताऊँ,
कहते है झुठा हो जाता है सपना बताने से
और उनकी भी सारी बातें सुन लुँ,
कितना तरसती है वो,
कितना बताना चाहती है, और मैं हूँ कि……

बेटे के बारे में पति से बात करनी है,
देखो मेरे बाद उसका ख्याल रखना,
ज्यादा सख्ती मत बरतना,
वो जो चाहे उसे करने देना,
वो चाहे करियर की बात हो या शादी की,
हाँ उसे बोर्डिगँ मत भेजना,
वहाँ रह जाएगा अकेला ही।
और हाँ तुम भी अपना ध्यान रखना,
मै तो हूँगी नहीं…
जैसे तैसे manage कर लेना,
मन चाहें तो कर लेना,
मुझ से क्यूँ कहलवाना चाहते हो कि दूसरी शादी मत करना,
पर मेरे बेटे का ध्यान तुम ही रखना ।

सासू माँ से भी sorry feel कर लुँगी,
कई बार उन्हें नाहक ही परेशान कर देती हूँ,
पर वो भी तो नही समझती,
पर कोई बात नहीं, मुझे तो जाना ही है ।
भाई-बहन को बहुत अच्छे से प्यार भरे SMS करुँगी,
कितना रोएंगे ना वो तो, जब मैं ना रहूँगी ।

और भी बहुत सारे काम है….
कितना चाहती थी…..
एक गरीब बच्चो की मदद के लिए संस्था खोलूँ,
आज रजिस्ट्रेशन तो करवा ही आऊँ,
मिसेज शर्मा को उसका Gen. Secretary बना दूँ,
बाकी सारी बातें उन्हें समझा जाऊँ,
मेरे बाद ये संस्था उन बच्चो के काम आए,
जीते जी ना सही, बाद ही में मेरा नाम सार्थक हो जाए ।
एक और काम की मन में तमन्ना रही,
एक पर्यावरण क्लब बनाऊँ,
जी भर कर फलों वाले पौधे लगाऊँ,
हर कोना हरा भरा लगे,
चारों तरफ सुंदर फूल और फल दिखें,
इसके लिए भी आज ही कुछ सदस्य बनाऊँगी,
उठते ही सबको फ़ोन लगाऊँगी,
कुछ भी ना बन पाया तो कुछ पौधे
आज ही सामने वाले पार्क में लगाऊँगी ।
ओ हो ,योगा क्लास शुरू कराने की भी कितनी हसरत रही,
पर मेरे लिए अब योगा……
मुझे तो अब शवासन में जाना होगा…
पर औरो के लिए ही सही,
अपार्टमैन्ट में सबसे बात करूगी,
और आज शाम को ही योगा की फर्स्ट क्लास शुरू करूगी।
याद आया कितनी कविताएँ भी तो पोस्ट करनी थी,
और वो जो अधूरी लिखी हैं, वो भी तो पूरी करनी थी,
और वो जो मन ही में हैं वो तो…..

और वो बङे-2 सपनें वो तो…..
वर्ल्ड टूर पर जाना था,
मुझे पूरा संसार घूम कर आना था,
खैर उपर जा कर पूरा करूँगी,
वहीं से सारा संसार देख लूँगी,
और वो अपना एक बङा सा घर,
अरे छोङो, यहाँ कौन रहना है जीवन भर।

तभी मोबाइल पर आरती की धुन बजी…
ओ! सुबह-2 बॉस का फ़ोन…
Good morning, sir.
Yes sir, I am fine.
I will submit the project well in time.
हे भगवान! ये तो याद ही ना रहा,
Meeting है, Project जमा कराना है,
ओफ्फो! P.T.M. में भी तो जाना है,
ये मोबाइल पर धुन फिर बजने लगी,
हाँ मोना, यार अच्छा किया याद दिलाया,
किट्टी मैं कैसे भूल गई ।
खैर…………………..
10 बजे Meeting attend की…
11-30 P.T.M. में पहुँच गई…
1 बजे Project submit कराया…
2-30 बजे किट्टी में बढ़िया lunch उङाया…
4 बजे डा0 साहब के बॉस के बेटे की सगाई थी,
वहाँ से वापसी में मैं मॉल होते हुए आई थी,
11 बजे जो घर आई तो नींद का पता ही ना चला,
आज का दिन कब उगा था और कब था ढला।
अगले दिन सुबह जो मैं उठी,
पिछली रात के सपने को याद कर खूब हँसी,
हर रात आँखें यूँ ही नये सपनों में खोती है,
दिन-ब-दिन ज़िन्दगी बस यूँ ही तमाम होती है,
आज भी वो सारे काम, वो सारे सपनें यूँ ही अधूरे पङे हैं,
ये ही लगता है हो जाएगें,
अभी तो ज़िन्दगी के बहुत दिन पङे हैं।

November 1, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

‘मुस्कान–एक महिने की !’

तुम्हारे छोटे-छोटे बन्द होठों पे,
ये लम्बी सी मुस्कान आई!
जाने क्या देखा होगा ख्वाब तुमने,
चाहो भी तो बता न पाओगी,
बस समझ ही लेना होगा हमें खुद से,
अपनी ही खुशी से कि तुम खुश हो,
प्रकृति की इस दुनिया में आकर!
बस युं ही मुस्कुराते रहना और,
बिखेरना खुशियाँ उन सब में,
जो तुम्हे चाहे, तुम्हे अपनाऐ,
और लेना चाहे, तुम्हे अपने
थोङा, थोङा और पास ।

October 14, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | 1 Comment

LIVELY DEAD.

Dated; 2008, MAY 10.
Today I saw a dead man.
He was so lively as if he will speak.
Oh now I am fine and it seems to be an absolute peace.
No tensions no pains,
Nothing to lose and heavy gains.
Hey you the live creatures live and cry,
You can’t even imagine what a life when you die.
With the heaps of joy,
You will wonder that now I can fly.
No burdens I have to bear,
So my eyes are without tears.
Nothing is dark everything shines,
I have achieved for which I ran for my whole life.
No money, no status, no bondage, nothing to share
No ways, no destination and from here
I don’t have to go any where.
So don’t miss me as I am fine,
Don’t ever remind me that I ever cried.
Live like lifeless, until you die.
But don’t cry,
Please for my happy life,
Don’t cry.

October 14, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

‘अजन्मी–THE UNBORN DAUGHTER’

प्यारी बेटी तुम्हारी चिट्ठी मिली
पुछा है तुमने तुम बन कर कली
क्युँ ना खिली ।
क्युँ ना मैंने तुम्हे अपना सहारा बनाया
क्युँ ना नन्ही आँखों में कोई सपना सजाया ।
क्युँ ना ये स्वप्निला संसार दिखाया
क्युँ जागने से पहले ही सदा के लिए सुलाया ।

प्यारी बिटिया,
जानती हूँ तुम्हारा आक्रोश बिल्कुल सही है ।
तुम्हारे ना होने में तुम्हारा दोष ज़रा भी नहीं है ।
तुम्हे तुम्हारा आकाश कैसे दुँ बिटिया
जबकि मेरे पैरों तले ज़मीन ही नही है ।
तुम तो फिर भी कह रही हो
मैं तो कह भी न पाई थी
अपने बाद भाई को लाऊँगी इस शर्त पर
दुनियाँ में आई थी ।
खुद आ कर यहाँ माँ को दोषी किया था ।
दादी ने तो देखते ही मुँह फेर लिया था ।
लङकियाँ ही पैदा करती है ये लाँछन भी दिया था।
पापा के expression तो देख ही ना पाई
कितनी फीकी थी वो बधाई कि
अच्छा फिर लक्ष्मी आई ।
अम्मा को maternity leave के बाद
फिर नौकरी पर जाना है ।
बस यही फिक्र कि लङकी जात
छोङुँ कहाँ कितना खराब ज़माना है ।
नौकर से भी डर, पङोसियों से भी डर
क्रच में भी छोङुँ तो छोटी है ये ही फिक्र
जैसे तैसे एक आया का हुआ इन्तजाम
जिसने मेरे बचपन को किया तमाम ।
पङोसी की किसी लङकी को किराएदार ने कुछ कह दिया था
सो माँ ने हमारा कहीं भी जाना बैन कर दिया था
लङकों से खेलना तो बिल्कुल मना था
बङी होती जा रही हो सदा ये ताना सुना था ।
अपनी मर्जी से अपने subjects भी ना ले पाई
L.L.B. करनी थी पर science दिलाई
डॉक्टर बन गई तो जीवन सुधर जाएगा
वकील बनी तो कोई मुश्किल से ब्याहेगा ।
सदा दुसरों के फैसलों को मान देती रही
एक दिन मेरा भी होगा यही सोच कर सहती रही
मुझे भी कभी आजादी होगी मैं भी खुद सोच पाँऊगी
अपने मुट्ठी भर आसमाँ को अपने चुने तारों से सजाऊँगी
पर ये कभी हो ना पाया
ना कभी आसमाँ मिला ना सजाया ।
किसी चैनल ने अभी एक न्यूज़ दिखाई है
नौ महीने की लङकी झाङियों में पाई है ।
नैना साहनी को भूले थे कि मधुमीता सुर्खियों में आई
जेसिका और आरूषि की तो अभी तक चल रही सुनवाई ।
तेरे और मेरे में एक जेनरेशन का फर्क है
पर बिटिया लङकियों के लिए तो ये आज भी नर्क है ।
आज भी मेरा सहमा सी व्यक्तित्व है
कलम भले ही कहे पर मन अन अभिव्यक्त है
ऐसी ही बौनी, अभिशप्त, अपाहिज ही
जिन्दगी है तुम्हे देने के लिए
तुम चाहोगी क्या
नहीं ना
तो फिर ज़रा रुक कर आना
नारी शक्ति, महिला आरक्षण, नवजागृति बङे
नये नये शब्द आ रहे हैं जमाने में
अगर कुछ मेरे हाथ भी आया
धूप का वो टुकङा गर मेरे आँगन उतर आया
तो मैं तुझे बुलाऊँगी
जो मैं ना बन सकी वो सब तुझे बनाऊँगी
फिर तु आना
पर देख आने से पहले
चिट्ठी जरूर लिखना ।
तुम्हारी माँ

October 13, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | 1 Comment

‘‘ये मुझे हुआ क्या है !’’

अभी कुछ दिनों की ही बात है
सब कुछ ठीक ठाक था ।
सूरज बस रोशनी ही था , आकाश बस नीला ही था
नदियाँ बस पानी ही था , रिश्ते बस रिश्ते ही थे
कहानियाँ बस कहानियाँ ही थी ।

और एक दिन अचानक ………………..

बरसों से गली के नुक्कङ पर गङा पत्थर
मुझे कुछ कह रहा था ।
पेङों पर हवा से हिलते पत्तों की
सुरसराहट मेरे कान सुनने लगे थे ।
आकाश बस नीला ना रहकर , रगों
से भर गया था , तरह तरह के चित्र
मेरी आँखों में भरने लगे थे ।
नदियाँ बस पानी ना रहकर , सागर की
दिवानी हो गई थी ,
मैं लोगों की आँखों में कॉर्निया के
पार देख पाने लगी थी
कभी दर्द , कभी खुशी , कभी वेदना , कभी संवेदना
सब समझ में आने लगी थी ।
अपने ये सब लक्षण जब एक विद्वान से कहे
तो उन्होने रोग गंभीर बताया
कहा कि उपचार असम्भव और लाईलाज़ है
आपमें कवि नामक असाध्य रोग का आग़ाज़ है ।
अपने इस रोग से अब मैं परेशान हूँ
मुझे हुआ क्या है मैं खुद ही हैरान हूँ ।

अब हर वक़्त हाथ में एक कलम होती है
वो सब चीज़े मुझसे बोलती हैं जो लोगों के लिए भ्रम होती है ।
अभी कुछ दिन हुए अपने घर गई थी
घर ने पत्थर होते हुए भी अपनी कहानी कही थी
फिर कुछ दिन हुए पुराने ज़ेवरों पर हाथ पङा
उनमें से कलम ने बुज़ुर्गों का चिन्तन गढ़ा
कुछ लङकियाँ जो मुझे देख कर मुस्काई
दिल ने उनकी मुस्कान की भी एक कविता बनाई
और ये ईद का चाँद भी इस तरह से आता न था
मेरे जिया से यूँ कविताएँ कराता न था ।
विश्वानन्द , रेणु , कलावती , मेधिनी , निशांत , नीरज और
सबके कमेंन्टस क्यूँ आए नहीं ,
इस बात पर भी मन ने एक कविता कही ।

घर और काम की दुनियाँ से अपर
दुनियाँ ये नयी है
इसमें अपने जैसे कितने कवि हैं ।
इन सब लोगों से एक रिश्ता सा बना है
क्योंकि ये वो भी समझते हैं जो ना कलम ने कहा है ।
कभी अपनी कविता में अपने भाव दर्शाते हैं
कभी औरों की कविता में ही अपने भाव पाते हैं
विश्वानन्द प्रेम में व्यथित हों तो व्यथित हो जाते हैं
आशीष अमेय के दोहे कभी फिर सुकून पहुँचाते हैं ।
मन में काँच के टुकङों की किरचें सी बिखरी हैं
लोग कहते हैं कि क्लाइडोस्कोप है
वाह पूनम जी आपकी कविताएँ लगातार निखरी हैं ।

हर हाल दिल का बस क़ाग़ज को कहने लगी हूँ
जाने सपनों की कौन सी दुनियाँ में रहने लगी हूँ
आँखों से नींद गायब है
मन को ना चैन रहता है
हर वक़्त ये कविता करने को
बेचैन रहता है ।
क्या आप लोग भी यूँ ही बेचैन हैं
क्या आप सबकी भी आँखें यूँ ही भारी हैं ।
ओ…हो ! फिर तो ये कोई साधारण नहीं
छूत की बिमारी है ।

October 12, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | 1 Comment

“बिन फेरे हम तेरे”–THE LIVE IN RELATIONSHIP

मुम्बई में मान्या रहती है । पहले कुछ परेशान थी । दो दिन से बङी खुश है । मुझे SMS किया कि मान्यता मिल गई है । अब उसके दिमाग का खलल मेरे दिमाग में है । सिर्फ मान्यता ही तो मिली है । पर बाकी सब………….
मुझे लगता है मैं सदा अपनी ही बात करती हूँ, सब उससे relate हो जाते हैं । आज सबकी बात करेगें ।

ऐसा होता है ना
जब शादी की बात चलती है
तो सपनें सजते हैं ना
सिर पर पल्लु लगा के
माथे पर बिंदी सजा के
कभी खुद को आईने में देखते हैं ना
मन खुद से बातें करता है ना
मैं ससुराल में सबको प्यार से रखुँगीं
ऐसे वादे भी करता है ना
सास, ससुर की सेवा करुँगीं
देवर, ननंद सब मेरे friends से होगें
और मेरे सब कुछ तो मेरे husband ही होगें ।
ऐसे ही सपनें संजोता है ना
कभी डूबता कभी तैरता मन
ऐसे ही सागर में खोता है ना

वो शादी की शॉपिंग, वो दोस्तो के बधाई कॉल्स
वो pre bridal sittings, फिर लहंगा choose करने में हो जाना बेहाल ।
Feonse के साथ होटल में छिप कर खाना
इतना नर्वस होना पर खुद को confident दिखाना ।
वो दोनों के relatives को discuss करना
शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा, खुद से ऐसा promise करना ।
शादी के दिन खुद को Top of the world महसूस करना ।
सब अच्छा ही होगा मन में एहसास भरना ।
वो फेरों की वेदी पर सातों वचनों को
मन ही मन मानना ।
अग्नि को साक्षी मानकर उन्हें अपना
सात जन्मों का साथी मानना ।
विदाई से पहले ही विदाई का सोच मन भर आना
वो फिर विडियो फिल्म के लिए प्यारा सा मुस्कुराना ।
विदाई पर माँ से और सब से मिल कर
जी भर कर रोना,
बैकग्राउंड में ‘बाबुल की दुआँए लेती जा’
वो पुराना सा गाना ।
गाङी में पिया का वो प्यार से चुप कराना,
वो आँसु भरी आँखों से धीरे से मुस्कुराना ।
ससुराल में सहमा सा वो पहला कदम,
चावल गिराने की वो पहली रस्म ।
दुनियाँ भर के वो रस्मों-रिवाज़,
कहीं से आ रही है मंगल-मुखियों की भारी आवाज़ ।
बधाईयों और आशीर्वादों की बौछार है
शादी तो हो गई अब तो पोते का इन्तजा़र है ।
वो पहले करवा चौथ का पहला श्रृंगार
वो पिया और चाँद का इकट्ठा इन्तज़ार ।
सास बङी strict है, पर ससुर मेरी side है
ये अपनी मम्मी के खिलाफ कभी नहीं बोलेगें, ये तो decide है ।
वो पहले बच्चे के मिल कर सपने सजाना
सालों साल युँ ही मायके ससुराल आना और जाना
बच्चों के होने पर मिल कर हवन करना
सारे रिश्तेदारों को फिर एकजुट करना ।
बच्चों को पारिवारिक संस्कार देना
सारे रिश्तेदारों का परिचय क्रमवार देना ।
कानपुर वाली मौसी, चण्डीगढ में मामा,
जयपुर वाली बुआ, और मायके में नाना ।
खलल मेरे दिमाग में फिर बढने लगा है
मान्यता से इन सबका क्या होगा, सोच में पङा है ।
Live in relationship को मान्यता मिली है
शादी से इतर नयी संस्था खुली है ।
शादी तो बन्धन है बरबादी है
इस नयी मान्यता में नयी आज़ादी है ।
ना शादी है, ना रिश्तेदार है, ना ससुराल का परिवेश है
इसमें पति-पत्नी को पूरा space है ।
पति-पत्नी क्या मैंने सही कहा….
पता नहीं इस Live in relationship में
इन दोनो को कहते हैं क्या….
वो सगाई, वो शादी, वो रस्में, वो फेरे,
इसमें तो शायद बस
बिन फेरे हम तेरे ।

कैसे होता होगा………..
ना सपने, ना शादी, ना लहंगा, ना ससुराल
ना pre bridal sittings, ना relatives, ना बधाई कॉल्स ।
ना फेरे, ना अग्नि साक्षी, ना सात जन्म, ना सात वचन
नया है ज़माना, अजीब सा है नया चलन
ना कोई बाबुल है ना है विदाई
पता नहीं लङके का ससुराल है कि लङकी मायके में आई ।
ना कोई रस्म है ना कोई रिवाज़ है
पता नहीं रिश्तों का अंजाम है कि रिश्तों का आगाज़ है ।
देखें ऐसी live in relationship बिना relations के
सिर्फ मान्यताओं से कब तक चलती है ।
हमने तो सुना था कि शादियाँ जन्नत में तय होती हैं
और ज़मीं पर ..
समाज, रिश्तेदारों और बुजुर्गों के आशीर्वाद से चलती हैं ।

October 12, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | 1 Comment