SOOKOON-E-ROOH

kuch pal sookoon ke…

‘‘सपना मेरा’’

बहुत दिनों से मेरी आखों ने कोई सपना नया नहीं बुना !
कुछ देर को बन्द हैं ये, जैसे कि लेती हैं सांस,
फिर देखेगीं नया सपना, बांधेगी नयी आस !
बनेगा या बिखरेगा वो सपना मेरा !
बस इसमें इक ही चीज जरुरी है साथ तेरा,
टूटॅगा तो दूंगी हथेली पर तेरी आंसु कुछ,
संवरेगा तो होऊगी तेरे होठों में मै भी खुश !
रोंऊगी तो लग जाऊंगी गले से तेरे !
खुश होऊंगी तो लग जाऊंगी गले से तेरे !
गोया कि मेरा हर जश्न हैं बाजुऍ तेरी,
गोया कि मेरा हर अश्क हैं बाजुऍ तेरी !
मैनें तो देख अपने दिल का पूरा हाल लिखा,
अब तु इतना तो कर, इक सपना तो दिखा…… !

जुलाई 6, 2008 Posted by | HINDI POETRY | Leave a Comment

SOOKOON-E-ROOH

तेरे दर्दे दिल की दवा हूँ मैं, आ मुझ पे एतबार कर,
बता मुझे क्या गुजर गया, ना मुझ से कोई सवाल कर,
आ करीब आ, मुझ में समां,
बस सुकून-ए-रूह की तलाश कर!

जुलाई 5, 2008 Posted by | HINDI POETRY | Leave a Comment

BAHUT NEEND AA RAHI HAI.

आज मेरे होटों पे बिन बात हसीं आई है ,
तेरी सोए हुई पलकों में कोई ख्वाब है शायद !
बस अब ज़ोर से नींद आ रही है,
अगली लाइन लिखने से पहले सो जाउंगी शायद!

जुलाई 5, 2008 Posted by | HINDI POETRY | Leave a Comment

‘‘रिम-झिम में मै’’

ट्पर-टपर गिरती इन बुंदों में,
छिपती सी मैं, उघाडती सी अपना मन !
निर्झर इन कणियों में, भिगती मेरी सोच,
जा टंगी हैं बाबुल के घर वाले किसी पेङ पर,
बस सहेलियां, सावन, झुला और मै !
इस उम्र में भी कल्पना का वो वेग,
उङाए ले जा रहा है मुझे ऊंचा और ऊंचा,
और वो पकङा नीम की आखिरी डाल को !
कोई रोक सकता है इस आवेग को,
तो बस मां की आवाज और रसोई से आती मीठी नमकीन खुशबूएं !
कोइ फिक्र है तो बस कैसे ली जाए दो बारियां और,
या सबसे कुछ ज्यादा झुले !
और आ ही गई वो आवाज,
कस कर होंठ भीच लिए है,
पर मन है कि जोर से बोला ”आई”….. !
एक भिगती गिलहरी ने अभी मेरे पास से,
उठाया ब्रेड का टुकङा और वापस अपने कोठर में !
काले बादलों का एक टुकङा अपने साथ ले उङा है,
मुझे भी भीगते भीगोते बाबुल से पिया के घर,
भई इतने अच्छे मौसम में कुछ आपके हाथ का हो जाए !
इन छोटी-२ मान मनुहारों में ढुंढती सी मैं,
जीवन का सुख, साधना और अपने जीने का पर्याय !
ब्ररामदे में बैठी पति के संग,
खाते, बतियाते, प्रकृति को सराहते,
और प्रशासन को धता बताते,
पैरो को भिगोते और कपङो को बचाते,
अचानक तेज हुई बारिश ने मेरे विचारो को थोङी देर रोका !
रूको… ,सुनो… , आराम से, फिसल मत जाना,
देखो किचङ मे मत खेलना,
बेटा मुझे काम है मै तुम्हारे साथ बारिश मे नही नहा सकती, कह कर
उसके साथ भीगती मै, सुखा सुखा सा नहाती,
उसमे जीती अपना बचपन, फिसलते फिसलते बचती
और गंदे पानी में उसके साथ कीचङ उछालती मैं,
जी लेती हुं सावन में वो क्षण जो
फिर नही आने वाले लौट कर !
मायके से आने वाले सिंधारे के इन्तजार में,
पति के लिए कुछ नया बनाने की सोच में,
बेटे को ना हुए ,पर हो सकने वाले जुकाम की फिक्र में,
मैं………… !
इन सब में मैं कहां हूं ?
मैड्म, बारिश में अकेले ही बॅठी है,
कुर्सी भीतर कर दूं !
हां.. , नहीं…. ,
अब तो भीग ही चुकी हूं मैं !

जुलाई 5, 2008 Posted by | HINDI POETRY | Leave a Comment

‘कविता अभी बाकी है’

आज मौसम अच्छा है,
और आपको इन्तजार भी है !
एक सुन्दर कविता आएगी क्या ?
बाहर टिप-टिप बारिश हो रही है,
और कविता है कि भीतर कहीं सो रही है !
चलुं कुछ देर बरिश में,
थोङे भाव आने दूं कवि मन में,
क्या जाने निर्झर बुंदें,
क्या सुना जाएं !
और खोले किवाङ……..
आया एक ठंडी भीगी हवा का झोका,
भिगो गया तन मन को !
डाल दिया है खुद को इस बयार में….
bhiगी खुब bhiगी….
ले लिया मजा बारिश का !
पर कविता ?
वो तो अभी baki है मेरे दोस्त !
क्या मुझे पतझङ का इन्तजार है ?…………….

जुलाई 5, 2008 Posted by | HINDI POETRY | | Leave a Comment

‘कविता फिर कभी……’

ना कोइ खुशी है,
और कोइ गम भी नही,
सो कविता करने का मौसम भी नही!
ना कोइ वेदना है…
ना कोई सवेदना है…
उनीदी सी आखो से घङी को देख्नना है!
बोझिल है पलके, आखो मे नीद है अभी,
सो इन्तजार कीजिए,
मौसम तो आने दिजिए!
देगे एक सुन्दर कविता फिर कभी……….

जुलाई 4, 2008 Posted by | HINDI POETRY | | Leave a Comment

   

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