‘मुस्कान–एक महिने की !’
तुम्हारे छोटे-छोटे बन्द होठों पे,
ये लम्बी सी मुस्कान आई!
जाने क्या देखा होगा ख्वाब तुमने,
चाहो भी तो बता न पाओगी,
बस समझ ही लेना होगा हमें खुद से,
अपनी ही खुशी से कि तुम खुश हो,
प्रकृति की इस दुनिया में आकर!
बस युं ही मुस्कुराते रहना और,
बिखेरना खुशियाँ उन सब में,
जो तुम्हे चाहे, तुम्हे अपनाऐ,
और लेना चाहे, तुम्हे अपने
थोङा, थोङा और पास ।
LIVELY DEAD.
Dated; 2008, MAY 10.
Today I saw a dead man.
He was so lively as if he will speak.
Oh now I am fine and it seems to be an absolute peace.
No tensions no pains,
Nothing to lose and heavy gains.
Hey you the live creatures live and cry,
You can’t even imagine what a life when you die.
With the heaps of joy,
You will wonder that now I can fly.
No burdens I have to bear,
So my eyes are without tears.
Nothing is dark everything shines,
I have achieved for which I ran for my whole life.
No money, no status, no bondage, nothing to share
No ways, no destination and from here
I don’t have to go any where.
So don’t miss me as I am fine,
Don’t ever remind me that I ever cried.
Live like lifeless, until you die.
But don’t cry,
Please for my happy life,
Don’t cry.
‘अजन्मी–THE UNBORN DAUGHTER’
प्यारी बेटी तुम्हारी चिट्ठी मिली
पुछा है तुमने तुम बन कर कली
क्युँ ना खिली ।
क्युँ ना मैंने तुम्हे अपना सहारा बनाया
क्युँ ना नन्ही आँखों में कोई सपना सजाया ।
क्युँ ना ये स्वप्निला संसार दिखाया
क्युँ जागने से पहले ही सदा के लिए सुलाया ।
प्यारी बिटिया,
जानती हूँ तुम्हारा आक्रोश बिल्कुल सही है ।
तुम्हारे ना होने में तुम्हारा दोष ज़रा भी नहीं है ।
तुम्हे तुम्हारा आकाश कैसे दुँ बिटिया
जबकि मेरे पैरों तले ज़मीन ही नही है ।
तुम तो फिर भी कह रही हो
मैं तो कह भी न पाई थी
अपने बाद भाई को लाऊँगी इस शर्त पर
दुनियाँ में आई थी ।
खुद आ कर यहाँ माँ को दोषी किया था ।
दादी ने तो देखते ही मुँह फेर लिया था ।
लङकियाँ ही पैदा करती है ये लाँछन भी दिया था।
पापा के expression तो देख ही ना पाई
कितनी फीकी थी वो बधाई कि
अच्छा फिर लक्ष्मी आई ।
अम्मा को maternity leave के बाद
फिर नौकरी पर जाना है ।
बस यही फिक्र कि लङकी जात
छोङुँ कहाँ कितना खराब ज़माना है ।
नौकर से भी डर, पङोसियों से भी डर
क्रच में भी छोङुँ तो छोटी है ये ही फिक्र
जैसे तैसे एक आया का हुआ इन्तजाम
जिसने मेरे बचपन को किया तमाम ।
पङोसी की किसी लङकी को किराएदार ने कुछ कह दिया था
सो माँ ने हमारा कहीं भी जाना बैन कर दिया था
लङकों से खेलना तो बिल्कुल मना था
बङी होती जा रही हो सदा ये ताना सुना था ।
अपनी मर्जी से अपने subjects भी ना ले पाई
L.L.B. करनी थी पर science दिलाई
डॉक्टर बन गई तो जीवन सुधर जाएगा
वकील बनी तो कोई मुश्किल से ब्याहेगा ।
सदा दुसरों के फैसलों को मान देती रही
एक दिन मेरा भी होगा यही सोच कर सहती रही
मुझे भी कभी आजादी होगी मैं भी खुद सोच पाँऊगी
अपने मुट्ठी भर आसमाँ को अपने चुने तारों से सजाऊँगी
पर ये कभी हो ना पाया
ना कभी आसमाँ मिला ना सजाया ।
किसी चैनल ने अभी एक न्यूज़ दिखाई है
नौ महीने की लङकी झाङियों में पाई है ।
नैना साहनी को भूले थे कि मधुमीता सुर्खियों में आई
जेसिका और आरूषि की तो अभी तक चल रही सुनवाई ।
तेरे और मेरे में एक जेनरेशन का फर्क है
पर बिटिया लङकियों के लिए तो ये आज भी नर्क है ।
आज भी मेरा सहमा सी व्यक्तित्व है
कलम भले ही कहे पर मन अन अभिव्यक्त है
ऐसी ही बौनी, अभिशप्त, अपाहिज ही
जिन्दगी है तुम्हे देने के लिए
तुम चाहोगी क्या
नहीं ना
तो फिर ज़रा रुक कर आना
नारी शक्ति, महिला आरक्षण, नवजागृति बङे
नये नये शब्द आ रहे हैं जमाने में
अगर कुछ मेरे हाथ भी आया
धूप का वो टुकङा गर मेरे आँगन उतर आया
तो मैं तुझे बुलाऊँगी
जो मैं ना बन सकी वो सब तुझे बनाऊँगी
फिर तु आना
पर देख आने से पहले
चिट्ठी जरूर लिखना ।
तुम्हारी माँ
‘‘ये मुझे हुआ क्या है !’’
अभी कुछ दिनों की ही बात है
सब कुछ ठीक ठाक था ।
सूरज बस रोशनी ही था , आकाश बस नीला ही था
नदियाँ बस पानी ही था , रिश्ते बस रिश्ते ही थे
कहानियाँ बस कहानियाँ ही थी ।
और एक दिन अचानक ………………..
बरसों से गली के नुक्कङ पर गङा पत्थर
मुझे कुछ कह रहा था ।
पेङों पर हवा से हिलते पत्तों की
सुरसराहट मेरे कान सुनने लगे थे ।
आकाश बस नीला ना रहकर , रगों
से भर गया था , तरह तरह के चित्र
मेरी आँखों में भरने लगे थे ।
नदियाँ बस पानी ना रहकर , सागर की
दिवानी हो गई थी ,
मैं लोगों की आँखों में कॉर्निया के
पार देख पाने लगी थी
कभी दर्द , कभी खुशी , कभी वेदना , कभी संवेदना
सब समझ में आने लगी थी ।
अपने ये सब लक्षण जब एक विद्वान से कहे
तो उन्होने रोग गंभीर बताया
कहा कि उपचार असम्भव और लाईलाज़ है
आपमें कवि नामक असाध्य रोग का आग़ाज़ है ।
अपने इस रोग से अब मैं परेशान हूँ
मुझे हुआ क्या है मैं खुद ही हैरान हूँ ।
अब हर वक़्त हाथ में एक कलम होती है
वो सब चीज़े मुझसे बोलती हैं जो लोगों के लिए भ्रम होती है ।
अभी कुछ दिन हुए अपने घर गई थी
घर ने पत्थर होते हुए भी अपनी कहानी कही थी
फिर कुछ दिन हुए पुराने ज़ेवरों पर हाथ पङा
उनमें से कलम ने बुज़ुर्गों का चिन्तन गढ़ा
कुछ लङकियाँ जो मुझे देख कर मुस्काई
दिल ने उनकी मुस्कान की भी एक कविता बनाई
और ये ईद का चाँद भी इस तरह से आता न था
मेरे जिया से यूँ कविताएँ कराता न था ।
विश्वानन्द , रेणु , कलावती , मेधिनी , निशांत , नीरज और
सबके कमेंन्टस क्यूँ आए नहीं ,
इस बात पर भी मन ने एक कविता कही ।
घर और काम की दुनियाँ से अपर
दुनियाँ ये नयी है
इसमें अपने जैसे कितने कवि हैं ।
इन सब लोगों से एक रिश्ता सा बना है
क्योंकि ये वो भी समझते हैं जो ना कलम ने कहा है ।
कभी अपनी कविता में अपने भाव दर्शाते हैं
कभी औरों की कविता में ही अपने भाव पाते हैं
विश्वानन्द प्रेम में व्यथित हों तो व्यथित हो जाते हैं
आशीष अमेय के दोहे कभी फिर सुकून पहुँचाते हैं ।
मन में काँच के टुकङों की किरचें सी बिखरी हैं
लोग कहते हैं कि क्लाइडोस्कोप है
वाह पूनम जी आपकी कविताएँ लगातार निखरी हैं ।
हर हाल दिल का बस क़ाग़ज को कहने लगी हूँ
जाने सपनों की कौन सी दुनियाँ में रहने लगी हूँ
आँखों से नींद गायब है
मन को ना चैन रहता है
हर वक़्त ये कविता करने को
बेचैन रहता है ।
क्या आप लोग भी यूँ ही बेचैन हैं
क्या आप सबकी भी आँखें यूँ ही भारी हैं ।
ओ…हो ! फिर तो ये कोई साधारण नहीं
छूत की बिमारी है ।
“बिन फेरे हम तेरे”–THE LIVE IN RELATIONSHIP
मुम्बई में मान्या रहती है । पहले कुछ परेशान थी । दो दिन से बङी खुश है । मुझे SMS किया कि मान्यता मिल गई है । अब उसके दिमाग का खलल मेरे दिमाग में है । सिर्फ मान्यता ही तो मिली है । पर बाकी सब………….
मुझे लगता है मैं सदा अपनी ही बात करती हूँ, सब उससे relate हो जाते हैं । आज सबकी बात करेगें ।
ऐसा होता है ना
जब शादी की बात चलती है
तो सपनें सजते हैं ना
सिर पर पल्लु लगा के
माथे पर बिंदी सजा के
कभी खुद को आईने में देखते हैं ना
मन खुद से बातें करता है ना
मैं ससुराल में सबको प्यार से रखुँगीं
ऐसे वादे भी करता है ना
सास, ससुर की सेवा करुँगीं
देवर, ननंद सब मेरे friends से होगें
और मेरे सब कुछ तो मेरे husband ही होगें ।
ऐसे ही सपनें संजोता है ना
कभी डूबता कभी तैरता मन
ऐसे ही सागर में खोता है ना
वो शादी की शॉपिंग, वो दोस्तो के बधाई कॉल्स
वो pre bridal sittings, फिर लहंगा choose करने में हो जाना बेहाल ।
Feonse के साथ होटल में छिप कर खाना
इतना नर्वस होना पर खुद को confident दिखाना ।
वो दोनों के relatives को discuss करना
शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा, खुद से ऐसा promise करना ।
शादी के दिन खुद को Top of the world महसूस करना ।
सब अच्छा ही होगा मन में एहसास भरना ।
वो फेरों की वेदी पर सातों वचनों को
मन ही मन मानना ।
अग्नि को साक्षी मानकर उन्हें अपना
सात जन्मों का साथी मानना ।
विदाई से पहले ही विदाई का सोच मन भर आना
वो फिर विडियो फिल्म के लिए प्यारा सा मुस्कुराना ।
विदाई पर माँ से और सब से मिल कर
जी भर कर रोना,
बैकग्राउंड में ‘बाबुल की दुआँए लेती जा’
वो पुराना सा गाना ।
गाङी में पिया का वो प्यार से चुप कराना,
वो आँसु भरी आँखों से धीरे से मुस्कुराना ।
ससुराल में सहमा सा वो पहला कदम,
चावल गिराने की वो पहली रस्म ।
दुनियाँ भर के वो रस्मों-रिवाज़,
कहीं से आ रही है मंगल-मुखियों की भारी आवाज़ ।
बधाईयों और आशीर्वादों की बौछार है
शादी तो हो गई अब तो पोते का इन्तजा़र है ।
वो पहले करवा चौथ का पहला श्रृंगार
वो पिया और चाँद का इकट्ठा इन्तज़ार ।
सास बङी strict है, पर ससुर मेरी side है
ये अपनी मम्मी के खिलाफ कभी नहीं बोलेगें, ये तो decide है ।
वो पहले बच्चे के मिल कर सपने सजाना
सालों साल युँ ही मायके ससुराल आना और जाना
बच्चों के होने पर मिल कर हवन करना
सारे रिश्तेदारों को फिर एकजुट करना ।
बच्चों को पारिवारिक संस्कार देना
सारे रिश्तेदारों का परिचय क्रमवार देना ।
कानपुर वाली मौसी, चण्डीगढ में मामा,
जयपुर वाली बुआ, और मायके में नाना ।
खलल मेरे दिमाग में फिर बढने लगा है
मान्यता से इन सबका क्या होगा, सोच में पङा है ।
Live in relationship को मान्यता मिली है
शादी से इतर नयी संस्था खुली है ।
शादी तो बन्धन है बरबादी है
इस नयी मान्यता में नयी आज़ादी है ।
ना शादी है, ना रिश्तेदार है, ना ससुराल का परिवेश है
इसमें पति-पत्नी को पूरा space है ।
पति-पत्नी क्या मैंने सही कहा….
पता नहीं इस Live in relationship में
इन दोनो को कहते हैं क्या….
वो सगाई, वो शादी, वो रस्में, वो फेरे,
इसमें तो शायद बस
बिन फेरे हम तेरे ।
कैसे होता होगा………..
ना सपने, ना शादी, ना लहंगा, ना ससुराल
ना pre bridal sittings, ना relatives, ना बधाई कॉल्स ।
ना फेरे, ना अग्नि साक्षी, ना सात जन्म, ना सात वचन
नया है ज़माना, अजीब सा है नया चलन
ना कोई बाबुल है ना है विदाई
पता नहीं लङके का ससुराल है कि लङकी मायके में आई ।
ना कोई रस्म है ना कोई रिवाज़ है
पता नहीं रिश्तों का अंजाम है कि रिश्तों का आगाज़ है ।
देखें ऐसी live in relationship बिना relations के
सिर्फ मान्यताओं से कब तक चलती है ।
हमने तो सुना था कि शादियाँ जन्नत में तय होती हैं
और ज़मीं पर ..
समाज, रिश्तेदारों और बुजुर्गों के आशीर्वाद से चलती हैं ।
‘‘अवतार हैं या……..’’
तुने कही इक कथा , बन गई जो सनातन
बिना दिए जन्म पैदा किये ऐसे अवतार जो रहेंगें युगान्तर ,
जिन्होने प्रस्तुत किये ऐसे आदर्श , कि बन गए खुद भगवान
उन्हे निभा न पाऐगें साधारण पुरूष ।
उस पर विडंबना ये कि ऐसे पुरूष एक या दो नही , हैं तैतीस करोङ
एक ओर है एक पत्नी का धर्म पालन
तो दुसरी ओर है महारास ।
एक ओर जला देने की बनाई परम्परा रावण को सीता के हरण
पर साल दर साल
दुसरी ओर संयुक्ता के अपहरण को दिया वीररूप अहसास ।
एक ओर दिया भाई ने त्याग का संदेश , और रखा चरण पादुका
को सिहांसन पर
वहीं भाईयों ने किया भाईयों का संहार , रखा स्त्रियों की भी लज्जा
को ताक पर
एक भाई ने किया भाई का चौदह बरस इन्तज़ार
वहीं दुसरी ओर एक भाई ने किया सुंई की नोक के राज पर भी एतराज़ ।
एक स्त्री ने पति से लिए वचन और दिया पुत्रसम को
चौदह बरस का बनवास ;
एक स्त्री ने बिना देखे बटँवा दिया एक स्त्री को पाँच भाईयों में जैसे कि
कोई वस्तु हो निःश्वास ।
मैं क्यूँ करुँ , मैं कैसे करुँ , मैं किस पर करुँ विश्वास ,
कि भगवान हैं , अवतार हैं, या पुरूष हैं बस थोङे खास ।
‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं एक ब्याही हूई बेटी हूँ ।
अक्सर माँ के घर जाती हूँ ।
और इसके लिए अपने पति से स्वीकृति लेती हूँ कि
क्या थोङे दिन अपने घर जा आँऊ ।
पति मुस्कुराते हुए गर्दन हिलातें हैं पर साथ ही
एक प्रश्नचिन्ह लगातें हैं । अपने घर जा रही हो ,
तो फिर ‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं अभी कोई बहस नही चाहती क्योंकि जाना चाहती हूँ ।
माँ के घर पहुँचती हूँ ।
अजीब कशिश है इन दिवारों में , इन दरवाजों में
लगता है खुद-ब-खुद खुलतें हैं मेरे लिए ,
बिना मेरे हाथ लगे ।
भाई के बच्चों की बुआ बनी उन्हे बताती हूँ
कि इन अलमारियों में छुपते थे कभी
इस छत से कूद कर पङोसियों के घर जाते
और यहाँ से निकल कर डरा देते
पीछे से भईया कभी ।
बच्चे बङी-बङी आँखें करते पुछते , पहले आप यहीं रहते थे
फिर अब क्यों नही रहते हर रोज़
पहले ये आपका घर था । अब ‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं कोई बहस नही चाहती क्योंकि जल्दी में हूँ , माँ से बात करना चाहती हूँ ।
माँ कुछ चिंतित सी हैं । पता नहीं पापा से कुछ बात हुई
या भाभी ने कुछ कहा । लो शुरू हो गई ……
बेटी मैंनें इस घर के लिए क्या कुछ नही किया
किन मुश्किलों से अपने हाथ से एक एक चीज़ बनाई ।
इसको सजाया सवाँरा , याद है टायलों का डिज़ाईन
चुनने के लिए कितनी दुकानों के चक्कर लगाए थे ।
और अब अपनी मर्ज़ी से इस घर में रह नही सकते ।
सब कमरों पर बहुओं का , बच्चों का कब्जा है ।
और अब ये इसे बेचना चाहते हैं । मैंनें बनाया है इसे ,
मैं इसे बिकने नहीं दूंगीं । ये जानते नही कि
‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं कोई बहस नही चाहती क्योंकि आसुँओं से बचना चाहती हूँ ।
भईया-भाभी के कमरे में दरवाजा खङका कर जाती हूँ ।
दीदी आप ही बताओ
हमें इस घर में नहीं रहना
पुराने डिज़ाईन का है । बच्चों के लिए सोसाइटी भी अच्छी नही है ।
पॉश एरिया में एक घर देख रखा है ।
पूरे पैसे एक ही बार में मांग रहे हैं ।
थोङे ही कम रहते हैं ।
अगर मम्मी पापा इसे बेच कर कुछ मदद कर दें तो ……
जीते जी कुछ दे जाए तो ………
इनके बाद तो वैसे भी …. और.
‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं कोई बहस नही चाहती क्योंकि जानती हूँ कि यहाँ बस मैं मेहमान हूँ ।
गेट के पास लॉन में पापा बैठे हैं ।
कब आई बेटा , रूकेगी क्या ,
अपनी मम्मी को समझा कर जाना
ये मोहताज़ी की उम्र है , इसमें इतनी ठसक ठीक नहीं ।
फिर अपने दिन क्यों भूलती है ।
जब गाँव की जमीन बिकवा कर यहाँ मुझे
शहर में ले आई थी ।
ये तो दुनियाँ की रीत है बेटा ,
इसे हँस कर निभाना चाहिए ,
अब इस उम्र में इस झगङे में क्या पङना कि वो घर किसका था और ….
‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं कोई बहस नही चाहती क्योंकि इस बहस से निकलना चाहती हूँ ।
इसका एक ही तरीका है कि चलुँ वापस , अपने घर
पति और बच्चे भी राह देखते होगें ।
गेट से बाहर निकलते ही लगा कि कोई बुला रहा है ।
कौन…. मुङ कर देखा , संगमरमर के पत्थर पर ,
भाई और पापा के नाम की तराशी नेमप्लेट लगी थी ,
पर बुलाया किसने ……………
जा रही हो पर मुझसे तो पुछो …..
क्या !
ये तो घर की दिवारें बोल रही है ।
हाँ ?
याद है जब नींव डाली गई
पहली ईंट रखी गई
उस पर गारा चिपका ईंट दर ईंट
मज़दूरों ने मुझे गढ़ा
मुझे लगा कि ये मज़दूर ही मेरे मालिक हैं
और चूंकि निर्माता हैं मेरे , तो शायद मैं इन्ही का हूँ ।
पर जैसे-जैसे मैं आसमान की ओर बढ़ता रहा ,
इनका कोई अता पता न रहा ।
फिर जब मुहुर्त हुआ सब देखने आए
मैं भी गर्व से तना प्रस्तुत रहा सबके लिए
सब पापा को बधाई दे रहे थे ।
मुझे लगा
मैं इन्ही का हूँ ।
तुम बच्चे मेरी दिवारों पर पेन्सिलों से
अपनी पाठशाला के शब्द लिखते
माँ जी मुझे साल दर साल पुतवाती-पुँझवाती
मुझे लगा
मैं इन्ही का हूँ ।
फिर मैं फूलों से सजाया गया
दुघिया रोशनियों में नहाया गया
तुम सबकी शादियाँ हुई
नई बहुएँ आई , उन्होनें मुझे अपनाया
अपने नए ढंग से सजाया
मेरा नाम बदल कर ससुराल हो गया
फिर मुझे लगा
मैं इन्ही का हूँ ।
पर अब जो मेरी दिवारों के कान
नई बातें सुन रहे हैं
मेरा तो कलेजा ही काँप जाता है
मुझे बेचने की बात हो रही हैं
देखो बेटा ,
तुम्हारे माँ बाप की जवानी की हसरतें ,
तुम्हारी बचपन की शरारतें ,
तुम सब की शादियाँ , फिर तुम्हारे बच्चे ,
इन सब हकीकतों का पत्थराया सबूत हूँ मैं ,
कोई आता है , इससे पहले कि वो बेल बजाता है ,
मेरे सीने पर गढ़ा ये संगमरमरी पत्थर
उसे मेरी पहचान बताता है ।
पर अब समय के साथ ,
तुम्हारे माँ बाप और
उनकी हसरतों के साथ ,
मैं भी बूढ़ा हो चला हूँ ।
अब इस उम्र में मेरे साथ ये मज़ाक न करो ।
न जाने किसके हाथ बेचा जाएगा ,
वो इसे फिर अपने नए ढंग से सजाएगा ,
मेरे सीने पर हथौङा चला ये पत्थर उखाङकर ,
अपने नाम का पत्थर लगवाएगा ।
बेटा,
आज तक तुम्हारे बाप के नाम से ही
अपनी पहचान बताता आया हूँ
इस बूढ़ापे में जबकि मुझे एल्ज़ाइमर हो चला है ,
कोई पुछेगा तो कैसे बताऊँगा , कि
‘‘ये घर किसका है ।’’
‘‘ वो पुराने चाँदी के ज़ेवर ’’
वो बहुत ही पुराने हैं
बङे ही भारी हैं
इस महगें ज़माने में
लगभग बेदाम हैं
पर मुझे बेहद पसन्द हैं वो
क्योंकि अनमोल हैं
एंटीक हैं
आजकल ऐसे ज़ेवर मिलते कहाँ हैं ।
फिर उनमें कुछ बात है
उन पर टंके ज़वाहरात
वो पुरानी कशीदाकारी
आज के जमाने से बिलकुल अलग
वो नायाब हैं ।
मेरे दिल के बङे ही क़रीब हैं वो
जानती हूँ उनके दामों कुछ न मिलेगा
फिर बिकाउ ही कहाँ हैं वो ।
वो तो बस सहेजने की चीज़ हैं ।
गाहे बगाहे पोटली से निकालो
प्यार भरी नज़र डालो
अन्दर से बाहर से अच्छे से
तबीयत से साफ करो
और सहज ही वापिस रख दो
उनकी उम्र बढ़ती है
वो पुराने चाँदी के ज़ेवर हैं ।
मुझे , आपको , हम सभी को उन्हें
बङे ध्यान से रखना चाहिए ।
इस चोर ज़माने में अकेले छोङने की
चीज़ नहीं हैं वो
और ना ही वृद्धआश्रमों में छोङ आने की ।
‘‘पुराने चाँदी के ज़ेवर हैं वो ।’’
‘‘हम बेटियाँ’’
कोई नीलम है कोई सुनीता है कोई कोमल है
बस सब में एक ही चीज़ कॉमन है ।
वो है मुस्कान ,
जो तुम में भी है
और मुझ में भी है ।
और ये बङी ही स्वभाविक है ।
पर ये बङी अजीब बात है ,
कि मेरा या तुम्हारा होना , ना होना
या तो पुण्य है या पाप है ।
क्यूँ कहा गया कि हम ऋणी हो जाए ।
सिर्फ इसलिए कि हम जन्मे गए ।
क्यूँ हमारा जन्म सिर्फ तभी सार्थक होगा
जब हम कुछ बन जाएँगी , लङको की बनिस्बत
जाइए हम नहीं मानते कोई ऋण ।
पर रूकिए ,
ये हमसे होगा ही नही
ये हमारा स्वभाव ही नही
हम तो फिर कोशिश करेगें
वो सब कुछ बनने की जो आप चाहते हैं
गर ना बन सके सानिया , कल्पना या किरण बेदी
रह जाए सिर्फ नीलम , सुनीता या कोमल बन कर
फिर भी वो तो बनेंगीं ही
जो लङके कभी नही बन पाएगें ।
एक बहुत ही प्यारी माँ , बहुत ही sweet बहने
और आगे आगे तो इकलौती बेटियाँ भी ।
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