‘‘हम बेटियाँ’’
कोई नीलम है कोई सुनीता है कोई कोमल है
बस सब में एक ही चीज़ कॉमन है ।
वो है मुस्कान ,
जो तुम में भी है
और मुझ में भी है ।
और ये बङी ही स्वभाविक है ।
पर ये बङी अजीब बात है ,
कि मेरा या तुम्हारा होना , ना होना
या तो पुण्य है या पाप है ।
क्यूँ कहा गया कि हम ऋणी हो जाए ।
सिर्फ इसलिए कि हम जन्मे गए ।
क्यूँ हमारा जन्म सिर्फ तभी सार्थक होगा
जब हम कुछ बन जाएँगी , लङको की बनिस्बत
जाइए हम नहीं मानते कोई ऋण ।
पर रूकिए ,
ये हमसे होगा ही नही
ये हमारा स्वभाव ही नही
हम तो फिर कोशिश करेगें
वो सब कुछ बनने की जो आप चाहते हैं
गर ना बन सके सानिया , कल्पना या किरण बेदी
रह जाए सिर्फ नीलम , सुनीता या कोमल बन कर
फिर भी वो तो बनेंगीं ही
जो लङके कभी नही बन पाएगें ।
एक बहुत ही प्यारी माँ , बहुत ही sweet बहने
और आगे आगे तो इकलौती बेटियाँ भी ।
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