‘‘ये मुझे हुआ क्या है !’’
अभी कुछ दिनों की ही बात है
सब कुछ ठीक ठाक था ।
सूरज बस रोशनी ही था , आकाश बस नीला ही था
नदियाँ बस पानी ही था , रिश्ते बस रिश्ते ही थे
कहानियाँ बस कहानियाँ ही थी ।
और एक दिन अचानक ………………..
बरसों से गली के नुक्कङ पर गङा पत्थर
मुझे कुछ कह रहा था ।
पेङों पर हवा से हिलते पत्तों की
सुरसराहट मेरे कान सुनने लगे थे ।
आकाश बस नीला ना रहकर , रगों
से भर गया था , तरह तरह के चित्र
मेरी आँखों में भरने लगे थे ।
नदियाँ बस पानी ना रहकर , सागर की
दिवानी हो गई थी ,
मैं लोगों की आँखों में कॉर्निया के
पार देख पाने लगी थी
कभी दर्द , कभी खुशी , कभी वेदना , कभी संवेदना
सब समझ में आने लगी थी ।
अपने ये सब लक्षण जब एक विद्वान से कहे
तो उन्होने रोग गंभीर बताया
कहा कि उपचार असम्भव और लाईलाज़ है
आपमें कवि नामक असाध्य रोग का आग़ाज़ है ।
अपने इस रोग से अब मैं परेशान हूँ
मुझे हुआ क्या है मैं खुद ही हैरान हूँ ।
अब हर वक़्त हाथ में एक कलम होती है
वो सब चीज़े मुझसे बोलती हैं जो लोगों के लिए भ्रम होती है ।
अभी कुछ दिन हुए अपने घर गई थी
घर ने पत्थर होते हुए भी अपनी कहानी कही थी
फिर कुछ दिन हुए पुराने ज़ेवरों पर हाथ पङा
उनमें से कलम ने बुज़ुर्गों का चिन्तन गढ़ा
कुछ लङकियाँ जो मुझे देख कर मुस्काई
दिल ने उनकी मुस्कान की भी एक कविता बनाई
और ये ईद का चाँद भी इस तरह से आता न था
मेरे जिया से यूँ कविताएँ कराता न था ।
विश्वानन्द , रेणु , कलावती , मेधिनी , निशांत , नीरज और
सबके कमेंन्टस क्यूँ आए नहीं ,
इस बात पर भी मन ने एक कविता कही ।
घर और काम की दुनियाँ से अपर
दुनियाँ ये नयी है
इसमें अपने जैसे कितने कवि हैं ।
इन सब लोगों से एक रिश्ता सा बना है
क्योंकि ये वो भी समझते हैं जो ना कलम ने कहा है ।
कभी अपनी कविता में अपने भाव दर्शाते हैं
कभी औरों की कविता में ही अपने भाव पाते हैं
विश्वानन्द प्रेम में व्यथित हों तो व्यथित हो जाते हैं
आशीष अमेय के दोहे कभी फिर सुकून पहुँचाते हैं ।
मन में काँच के टुकङों की किरचें सी बिखरी हैं
लोग कहते हैं कि क्लाइडोस्कोप है
वाह पूनम जी आपकी कविताएँ लगातार निखरी हैं ।
हर हाल दिल का बस क़ाग़ज को कहने लगी हूँ
जाने सपनों की कौन सी दुनियाँ में रहने लगी हूँ
आँखों से नींद गायब है
मन को ना चैन रहता है
हर वक़्त ये कविता करने को
बेचैन रहता है ।
क्या आप लोग भी यूँ ही बेचैन हैं
क्या आप सबकी भी आँखें यूँ ही भारी हैं ।
ओ…हो ! फिर तो ये कोई साधारण नहीं
छूत की बिमारी है ।
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हमें तो समझ में आ गया कि आपको हुआ क्या है…
अच्छी रचना