SOOKOON-E-ROOH

kuch pal sookoon ke…

“बिन फेरे हम तेरे”–THE LIVE IN RELATIONSHIP

मुम्बई में मान्या रहती है । पहले कुछ परेशान थी । दो दिन से बङी खुश है । मुझे SMS किया कि मान्यता मिल गई है । अब उसके दिमाग का खलल मेरे दिमाग में है । सिर्फ मान्यता ही तो मिली है । पर बाकी सब………….
मुझे लगता है मैं सदा अपनी ही बात करती हूँ, सब उससे relate हो जाते हैं । आज सबकी बात करेगें ।

ऐसा होता है ना
जब शादी की बात चलती है
तो सपनें सजते हैं ना
सिर पर पल्लु लगा के
माथे पर बिंदी सजा के
कभी खुद को आईने में देखते हैं ना
मन खुद से बातें करता है ना
मैं ससुराल में सबको प्यार से रखुँगीं
ऐसे वादे भी करता है ना
सास, ससुर की सेवा करुँगीं
देवर, ननंद सब मेरे friends से होगें
और मेरे सब कुछ तो मेरे husband ही होगें ।
ऐसे ही सपनें संजोता है ना
कभी डूबता कभी तैरता मन
ऐसे ही सागर में खोता है ना

वो शादी की शॉपिंग, वो दोस्तो के बधाई कॉल्स
वो pre bridal sittings, फिर लहंगा choose करने में हो जाना बेहाल ।
Feonse के साथ होटल में छिप कर खाना
इतना नर्वस होना पर खुद को confident दिखाना ।
वो दोनों के relatives को discuss करना
शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा, खुद से ऐसा promise करना ।
शादी के दिन खुद को Top of the world महसूस करना ।
सब अच्छा ही होगा मन में एहसास भरना ।
वो फेरों की वेदी पर सातों वचनों को
मन ही मन मानना ।
अग्नि को साक्षी मानकर उन्हें अपना
सात जन्मों का साथी मानना ।
विदाई से पहले ही विदाई का सोच मन भर आना
वो फिर विडियो फिल्म के लिए प्यारा सा मुस्कुराना ।
विदाई पर माँ से और सब से मिल कर
जी भर कर रोना,
बैकग्राउंड में ‘बाबुल की दुआँए लेती जा’
वो पुराना सा गाना ।
गाङी में पिया का वो प्यार से चुप कराना,
वो आँसु भरी आँखों से धीरे से मुस्कुराना ।
ससुराल में सहमा सा वो पहला कदम,
चावल गिराने की वो पहली रस्म ।
दुनियाँ भर के वो रस्मों-रिवाज़,
कहीं से आ रही है मंगल-मुखियों की भारी आवाज़ ।
बधाईयों और आशीर्वादों की बौछार है
शादी तो हो गई अब तो पोते का इन्तजा़र है ।
वो पहले करवा चौथ का पहला श्रृंगार
वो पिया और चाँद का इकट्ठा इन्तज़ार ।
सास बङी strict है, पर ससुर मेरी side है
ये अपनी मम्मी के खिलाफ कभी नहीं बोलेगें, ये तो decide है ।
वो पहले बच्चे के मिल कर सपने सजाना
सालों साल युँ ही मायके ससुराल आना और जाना
बच्चों के होने पर मिल कर हवन करना
सारे रिश्तेदारों को फिर एकजुट करना ।
बच्चों को पारिवारिक संस्कार देना
सारे रिश्तेदारों का परिचय क्रमवार देना ।
कानपुर वाली मौसी, चण्डीगढ में मामा,
जयपुर वाली बुआ, और मायके में नाना ।
खलल मेरे दिमाग में फिर बढने लगा है
मान्यता से इन सबका क्या होगा, सोच में पङा है ।
Live in relationship को मान्यता मिली है
शादी से इतर नयी संस्था खुली है ।
शादी तो बन्धन है बरबादी है
इस नयी मान्यता में नयी आज़ादी है ।
ना शादी है, ना रिश्तेदार है, ना ससुराल का परिवेश है
इसमें पति-पत्नी को पूरा space है ।
पति-पत्नी क्या मैंने सही कहा….
पता नहीं इस Live in relationship में
इन दोनो को कहते हैं क्या….
वो सगाई, वो शादी, वो रस्में, वो फेरे,
इसमें तो शायद बस
बिन फेरे हम तेरे ।

कैसे होता होगा………..
ना सपने, ना शादी, ना लहंगा, ना ससुराल
ना pre bridal sittings, ना relatives, ना बधाई कॉल्स ।
ना फेरे, ना अग्नि साक्षी, ना सात जन्म, ना सात वचन
नया है ज़माना, अजीब सा है नया चलन
ना कोई बाबुल है ना है विदाई
पता नहीं लङके का ससुराल है कि लङकी मायके में आई ।
ना कोई रस्म है ना कोई रिवाज़ है
पता नहीं रिश्तों का अंजाम है कि रिश्तों का आगाज़ है ।
देखें ऐसी live in relationship बिना relations के
सिर्फ मान्यताओं से कब तक चलती है ।
हमने तो सुना था कि शादियाँ जन्नत में तय होती हैं
और ज़मीं पर ..
समाज, रिश्तेदारों और बुजुर्गों के आशीर्वाद से चलती हैं ।

अक्टूबर 12, 2008 - Posted by | HINDI POETRY |

1 टिप्पणी »

  1. hello,

    nice web-bloge……and subjsct,……..really.

    visit at :sanjayoscar.worldpress.com

    -Sanjay Nimavat

    Comment by sanjayoscar | नवम्बर 3, 2008 | Reply


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