‘‘मेरी कविता-मेरी हमदम मेरी हमसफर’’
मन के किसी छोटे कोने मे बसे गावँ सी होती है मेरी कविता
पुराने किसी बरगद के पेङ की छावँ सी होती है मेरी कविता
मन दुखी हो तो माँ के आँचल सा प्यार देती है
बेसहारा ,बेचारा भावो को कागज पर उतार देती है
मै मन से और मेरा मन मुझ से जाने कितनी बातें करते है
दोनों मिल कर फिर सारी दूनियाँ मे घूमा करते है
कहीं कहीं इकठ्ठे दोनों अटक से जाते है
कुछ शब्द खोजते है,कोई लय नई बनाते है
फिर अपनी हमसफर लेखनी को बुलवाते है
उसे समझाते है कि दरअसल हम कहना क्या चाहते है
लेखनी चुपके से कोरे कागज के कान में कुछ कहती है
और कब से कोरे पङे उस कागज का मोल ही बदल देती है
पर सारी बातें भी कागज को कहाँ बता पाते है
कितने राज तो वहीं कहीं कविता के पास ही दफन हो जाते है
आसूँ कहीं जो किसी अक्षर पर गिर जाते है
दाग कागज पर भले ही रह जाए पर दिल से तो धुल ही जाते है
मेरी कविता में जीता रहता है बस आमजन
परत दर परत उघङता रहता है मानस मन
कहाँ मेरे बस का रहा अब ये आवारापन
जाने किस मोङ पर ले जा छोङेगा ये बंजारापन
मेरी तो पुराने गहनो सी पोटली में बधी रखी है
मेरी तो सबसे प्यारी ,राजदार सी ये सखी है
कुछ आसुओं के नग ,कुछ मुस्कान के मोती थोङी चाँदी सी हँसी
जब भी खोलु होठों पे दे जाती है इक अनकही सी खुशी
मेरी तरह तुम भी इन्हें बस लुत्फ उठाने के लिए पढो
मेरे भावो से समझो या अपने नये भावो में गढो
ठंडी ब्यार सी है ये दिल को छू कर जाऐगी
मेरी तो महकाई है आपकी भी जिदगीं महकाएगी
उदास रातों में कहीं जुगनु सी टिमटिमाएगी
मेरी कविता ही नही मेरा भरोसा भी हैं ये
कहीं भटकनें जो लगी तो रास्ता दिखाएगी !
“मेरी बगिया में महकते रिश्ते”
आज एक लेख पढ कर
रिश्तो को एक नये रुप मे देखा
अपने घर के पिछवाडे़
अपनी बगिया मे जो कदम रखा
तो और दिनो से बिल्कुल अलग था
वो सफेद गुलदावरी का पॉधा
वो मेरा बेटा है
बहुत ही प्यारा फूलो से लक-दक
उससे नजरे हटती ही नही
पूरी बगिया में सबसे पहले नजरे उसी पर टिकती है
उसके साईज को ले कर मैं हमेशा सोचती हूँ
कि ये और बडा, और बडा हो जाए तो
ज्यादा अच्छा लगे
वो दूसरे कोने में लगा मुस्कुराता सा लाल गुलाब
वो मेरे पति है
इन्हीं से ये बगिया रोशन है
बगिया के सारे फूलों के रंगो को अपने मे समाहित रखते हैं
फिर भी अपनी एक अलग पहचान, मुस्कान और शान रखते हैं
वो सचमुच राजा हैं इस बगिया के
बगिया में छोटे पौधौं और फूलों के बीच
बडी ही माकूल जगह एक शीशम का पेड खडा है
उसे पता है बगिया में कब कितनी धूप और कितनी छावँ वाछिँत है
वो सासू माँ है
बिल्कूल तटस्थ एकदम मुस्तैद
कभी-कभी लगता है जब सब सो जाते है
तब ये पेड ही सब पर नजर रखता है
सबके खाद पानी पर निगरानी रखता है
और सबको बस अपनी नजरों से
ही व्यवहारिक ज्ञान सिखाता रहता है
ये जो नरम मुलायम घास है ना
ये हमारा कुता जानी है
हर वक्त आमत्रण सा निहीत है इसमें
आओ मेरे साथ खेलो
लोटपोट हो जाओ मुझमें
भूल जाओ सारे तनाव
अपनी सारी परेशानियाँ समा जाने दो मुझ में
बस दो घडी, आओ मेरे पास आओ
और ये जो हरी पतियों और सफेद फूलों वाला चाँदनी का पेड है ना
ये मैं हूँ
हाँ, इस घर की, बगिया की
चाँदनी सी मैं, पूनम परिणिता
कहते है ना कि सफेद रंग से ही सारे रंग बनते है
बिल्कूल सच है
बीच-बीच में बगिया मे मेहमानों से
मौसमी फूल पौधे आते जाते रहते है
छोड जाते हैं अपनी मुस्कान, अपने रंग
अब ये हम पर होता है कि
हम उनसे क्या सीखते हैं
आप भी आज जब अपनी बगिया में जाऐगें
अपने पौधौ को देख कर प्यार से मुस्कुराऐगें
तब
देखते ही देखते फूल सारे रिश्तों में बदल जाऐगे
‘‘विरह—THE OLD LOVE STORY’’
एक थी दादी एक थे दादा
भोली थी दादी कङक थे दादा ।
दादी हरदम काम थी करती
दादा हरदम हुक्का पीते
दादी सबको प्यार थी करती
हङकाते रहते थे दादा ।
जाने क्युँ दादी को दादा कभी प्यार से ना बोलते थे
कङक माँङ का साफा लगाते, बस अपनी अकङ मे डोलते थे ।
गज भर घुंघट मे लिपटी दादी, सबका ध्यान वो रखती थी
नाती, पोते, बकरी, गैया सबका पेट वो भरती थी
बार बार दादी को दादा आवाज लगाते रहते थे
गलती हो किसी की भी पर उन्हे सुनाते रहते थे ।
छोटे से कद की सलोनी सी दादी
दादा लम्बे चौङे थे ।
बङी बङी मूछे थी उनकी
बाल मगर कुछ थोङे थे ।
सबको खिला कर दादी सबसे बाद में खाया करती थी
दादा की तो एक आवाज़ से सोते उठ जाया करती थी ।
दादा कभी बीमार जो होते दादी चिंतित हो जाती थी
लाख कहो पर दादी एक कौर ना खाती थी ।
दादी कहती दादा से……
कुछ ध्यान अपना भी किया करो
मीठा और घी कुछ कम कर दो
हुक्का ज्यादा ना पिया करो ।
हर सुबह वो पूजा करती, सारे करती व्रत त्योहार
उनका बस चलता तो दादा पर करती कई जन्म न्योछार ।
दादी सुनाती बहुओं को, कैसे हुआ था दादा से ब्याह
बङी शान से कहती कि, और कौन कर पाता इनसे निबाह ।
दादा हुए बीमार जो इक बार, तो दादी ने दिन रात एक किया
मन से सेवा में लगी रही, अपने तन का ना ध्यान किया ।
डरती रहती थी दादी, दादा को कुछ ना हो जाए
इनका ख्याल रखना प्रभू, दिन रात ये माला वो फिराये ।
दादा हो गए ठीक, तो दादी ने प्रसाद चढ़ाया था
इतनी भाग दौङ से हल्का दादी को बुखार चढ़ आया था ।
उस शाम बेटे बहुओं और सब बच्चो को बुलवाया था
जाने दादी को हुआ क्या, बस एक फरमान सुनाया था ।
सुनो छोटी सी बात मेरी
ना चाहती तुमसे कुछ ज्यादा,
दादा का ख्याल सब रखोगे,
बस करो मुझसे तुम ये वादा ।
बस इतना कहा दादी ने और उनकी आँखें हौले से बन्द हुई
बस बचा बाकी शरीर उनका, आत्मा तो उनकी स्वछन्द हुई ।
और उसके बाद से दादा को किसी ने हङकाते नही देखा
मीठा, घी सब कर दिया बंद, हुक्का गुङगुङाते नही देखा
वो दादा हरदम जो मूछों को ऐठे फिरते थे
अब जाने क्युँ हर वक्त वो बेचारे से दिखते थे
आँखें कुछ ना कहती उनकी,
पर मन भरा भरा सा रहता था
कोई दादी का नाम ना ले दे कहीं,
यूँ डरा डरा सा रहता था ।
दो दिन यूँ ही बस निकल गए….
तीसरा दिन जब चढ़ आया
दादा ने भी सबको तब अपने पास था बुलवाया
आओ बच्चो तुम सबको मैं
आखिरी बात बताता हूँ
दादी वहाँ अकेली होगी
सो मैं जल्दी से जाता हूँ ।
बस इतना कहा दादा ने और उनकी आँखें हौले से बन्द हुई
बस बचा बाकी शरीर उनका आत्मा तो उनकी भी स्वछन्द हुई ।
ये पुरानी प्रेम कहानी थी
बस ये इसका अन्जाम था
जाने जन्मों का बंधन था, प्यार था
कि विरह इसका नाम था ।
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