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kuch pal sookoon ke…

‘‘विरह—THE OLD LOVE STORY’’

एक थी दादी एक थे दादा
भोली थी दादी कङक थे दादा ।
दादी हरदम काम थी करती
दादा हरदम हुक्का पीते
दादी सबको प्यार थी करती
हङकाते रहते थे दादा ।
जाने क्युँ दादी को दादा कभी प्यार से ना बोलते थे
कङक माँङ का साफा लगाते, बस अपनी अकङ मे डोलते थे ।
गज भर घुंघट मे लिपटी दादी, सबका ध्यान वो रखती थी
नाती, पोते, बकरी, गैया सबका पेट वो भरती थी
बार बार दादी को दादा आवाज लगाते रहते थे
गलती हो किसी की भी पर उन्हे सुनाते रहते थे ।
छोटे से कद की सलोनी सी दादी
दादा लम्बे चौङे थे ।
बङी बङी मूछे थी उनकी
बाल मगर कुछ थोङे थे ।
सबको खिला कर दादी सबसे बाद में खाया करती थी
दादा की तो एक आवाज़ से सोते उठ जाया करती थी ।
दादा कभी बीमार जो होते दादी चिंतित हो जाती थी
लाख कहो पर दादी एक कौर ना खाती थी ।
दादी कहती दादा से……
कुछ ध्यान अपना भी किया करो
मीठा और घी कुछ कम कर दो
हुक्का ज्यादा ना पिया करो ।
हर सुबह वो पूजा करती, सारे करती व्रत त्योहार
उनका बस चलता तो दादा पर करती कई जन्म न्योछार ।
दादी सुनाती बहुओं को, कैसे हुआ था दादा से ब्याह
बङी शान से कहती कि, और कौन कर पाता इनसे निबाह ।
दादा हुए बीमार जो इक बार, तो दादी ने दिन रात एक किया
मन से सेवा में लगी रही, अपने तन का ना ध्यान किया ।
डरती रहती थी दादी, दादा को कुछ ना हो जाए
इनका ख्याल रखना प्रभू, दिन रात ये माला वो फिराये ।
दादा हो गए ठीक, तो दादी ने प्रसाद चढ़ाया था
इतनी भाग दौङ से हल्का दादी को बुखार चढ़ आया था ।
उस शाम बेटे बहुओं और सब बच्चो को बुलवाया था
जाने दादी को हुआ क्या, बस एक फरमान सुनाया था ।
सुनो छोटी सी बात मेरी
ना चाहती तुमसे कुछ ज्यादा,
दादा का ख्याल सब रखोगे,
बस करो मुझसे तुम ये वादा ।
बस इतना कहा दादी ने और उनकी आँखें हौले से बन्द हुई
बस बचा बाकी शरीर उनका, आत्मा तो उनकी स्वछन्द हुई ।

और उसके बाद से दादा को किसी ने हङकाते नही देखा
मीठा, घी सब कर दिया बंद, हुक्का गुङगुङाते नही देखा
वो दादा हरदम जो मूछों को ऐठे फिरते थे
अब जाने क्युँ हर वक्त वो बेचारे से दिखते थे
आँखें कुछ ना कहती उनकी,
पर मन भरा भरा सा रहता था
कोई दादी का नाम ना ले दे कहीं,
यूँ डरा डरा सा रहता था ।
दो दिन यूँ ही बस निकल गए….
तीसरा दिन जब चढ़ आया
दादा ने भी सबको तब अपने पास था बुलवाया
आओ बच्चो तुम सबको मैं
आखिरी बात बताता हूँ
दादी वहाँ अकेली होगी
सो मैं जल्दी से जाता हूँ ।
बस इतना कहा दादा ने और उनकी आँखें हौले से बन्द हुई
बस बचा बाकी शरीर उनका आत्मा तो उनकी भी स्वछन्द हुई ।
ये पुरानी प्रेम कहानी थी
बस ये इसका अन्जाम था
जाने जन्मों का बंधन था, प्यार था
कि विरह इसका नाम था ।

नवम्बर 15, 2008 - Posted by | HINDI POETRY

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