SOOKOON-E-ROOH

kuch pal sookoon ke…

‘‘अवतार हैं या……..’’

तुने कही इक कथा , बन गई जो सनातन
बिना दिए जन्म पैदा किये ऐसे अवतार जो रहेंगें युगान्तर ,
जिन्होने प्रस्तुत किये ऐसे आदर्श , कि बन गए खुद भगवान
उन्हे निभा न पाऐगें साधारण पुरूष ।
उस पर विडंबना ये कि ऐसे पुरूष एक या दो नही , हैं तैतीस करोङ
एक ओर है एक पत्नी का धर्म पालन
तो दुसरी ओर है महारास ।
एक ओर जला देने की बनाई परम्परा रावण को सीता के हरण
पर साल दर साल
दुसरी ओर संयुक्ता के अपहरण को दिया वीररूप अहसास ।
एक ओर दिया भाई ने त्याग का संदेश , और रखा चरण पादुका
को सिहांसन पर
वहीं भाईयों ने किया भाईयों का संहार , रखा स्त्रियों की भी लज्जा
को ताक पर
एक भाई ने किया भाई का चौदह बरस इन्तज़ार
वहीं दुसरी ओर एक भाई ने किया सुंई की नोक के राज पर भी एतराज़ ।
एक स्त्री ने पति से लिए वचन और दिया पुत्रसम को
चौदह बरस का बनवास ;
एक स्त्री ने बिना देखे बटँवा दिया एक स्त्री को पाँच भाईयों में जैसे कि
कोई वस्तु हो निःश्वास ।
मैं क्यूँ करुँ , मैं कैसे करुँ , मैं किस पर करुँ विश्वास ,
कि भगवान हैं , अवतार हैं, या पुरूष हैं बस थोङे खास ।

October 6, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

‘‘ये घर किसका है ।’’

मैं एक ब्याही हूई बेटी हूँ ।
अक्सर माँ के घर जाती हूँ ।
और इसके लिए अपने पति से स्वीकृति लेती हूँ कि
क्या थोङे दिन अपने घर जा आँऊ ।
पति मुस्कुराते हुए गर्दन हिलातें हैं पर साथ ही
एक प्रश्नचिन्ह लगातें हैं । अपने घर जा रही हो ,
तो फिर ‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं अभी कोई बहस नही चाहती क्योंकि जाना चाहती हूँ ।
माँ के घर पहुँचती हूँ ।
अजीब कशिश है इन दिवारों में , इन दरवाजों में
लगता है खुद-ब-खुद खुलतें हैं मेरे लिए ,
बिना मेरे हाथ लगे ।
भाई के बच्चों की बुआ बनी उन्हे बताती हूँ
कि इन अलमारियों में छुपते थे कभी
इस छत से कूद कर पङोसियों के घर जाते
और यहाँ से निकल कर डरा देते
पीछे से भईया कभी ।
बच्चे बङी-बङी आँखें करते पुछते , पहले आप यहीं रहते थे
फिर अब क्यों नही रहते हर रोज़
पहले ये आपका घर था । अब ‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं कोई बहस नही चाहती क्योंकि जल्दी में हूँ , माँ से बात करना चाहती हूँ ।
माँ कुछ चिंतित सी हैं । पता नहीं पापा से कुछ बात हुई
या भाभी ने कुछ कहा । लो शुरू हो गई ……
बेटी मैंनें इस घर के लिए क्या कुछ नही किया
किन मुश्किलों से अपने हाथ से एक एक चीज़ बनाई ।
इसको सजाया सवाँरा , याद है टायलों का डिज़ाईन
चुनने के लिए कितनी दुकानों के चक्कर लगाए थे ।
और अब अपनी मर्ज़ी से इस घर में रह नही सकते ।
सब कमरों पर बहुओं का , बच्चों का कब्जा है ।
और अब ये इसे बेचना चाहते हैं । मैंनें बनाया है इसे ,
मैं इसे बिकने नहीं दूंगीं । ये जानते नही कि
‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं कोई बहस नही चाहती क्योंकि आसुँओं से बचना चाहती हूँ ।
भईया-भाभी के कमरे में दरवाजा खङका कर जाती हूँ ।
दीदी आप ही बताओ
हमें इस घर में नहीं रहना
पुराने डिज़ाईन का है । बच्चों के लिए सोसाइटी भी अच्छी नही है ।
पॉश एरिया में एक घर देख रखा है ।
पूरे पैसे एक ही बार में मांग रहे हैं ।
थोङे ही कम रहते हैं ।
अगर मम्मी पापा इसे बेच कर कुछ मदद कर दें तो ……
जीते जी कुछ दे जाए तो ………
इनके बाद तो वैसे भी …. और.
‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं कोई बहस नही चाहती क्योंकि जानती हूँ कि यहाँ बस मैं मेहमान हूँ ।
गेट के पास लॉन में पापा बैठे हैं ।
कब आई बेटा , रूकेगी क्या ,
अपनी मम्मी को समझा कर जाना
ये मोहताज़ी की उम्र है , इसमें इतनी ठसक ठीक नहीं ।
फिर अपने दिन क्यों भूलती है ।
जब गाँव की जमीन बिकवा कर यहाँ मुझे
शहर में ले आई थी ।
ये तो दुनियाँ की रीत है बेटा ,
इसे हँस कर निभाना चाहिए ,
अब इस उम्र में इस झगङे में क्या पङना कि वो घर किसका था और ….
‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं कोई बहस नही चाहती क्योंकि इस बहस से निकलना चाहती हूँ ।
इसका एक ही तरीका है कि चलुँ वापस , अपने घर
पति और बच्चे भी राह देखते होगें ।
गेट से बाहर निकलते ही लगा कि कोई बुला रहा है ।
कौन…. मुङ कर देखा , संगमरमर के पत्थर पर ,
भाई और पापा के नाम की तराशी नेमप्लेट लगी थी ,
पर बुलाया किसने ……………
जा रही हो पर मुझसे तो पुछो …..
क्या !
ये तो घर की दिवारें बोल रही है ।
हाँ ?
याद है जब नींव डाली गई
पहली ईंट रखी गई
उस पर गारा चिपका ईंट दर ईंट
मज़दूरों ने मुझे गढ़ा
मुझे लगा कि ये मज़दूर ही मेरे मालिक हैं
और चूंकि निर्माता हैं मेरे , तो शायद मैं इन्ही का हूँ ।
पर जैसे-जैसे मैं आसमान की ओर बढ़ता रहा ,
इनका कोई अता पता न रहा ।
फिर जब मुहुर्त हुआ सब देखने आए
मैं भी गर्व से तना प्रस्तुत रहा सबके लिए
सब पापा को बधाई दे रहे थे ।
मुझे लगा
मैं इन्ही का हूँ ।
तुम बच्चे मेरी दिवारों पर पेन्सिलों से
अपनी पाठशाला के शब्द लिखते
माँ जी मुझे साल दर साल पुतवाती-पुँझवाती
मुझे लगा
मैं इन्ही का हूँ ।
फिर मैं फूलों से सजाया गया
दुघिया रोशनियों में नहाया गया
तुम सबकी शादियाँ हुई
नई बहुएँ आई , उन्होनें मुझे अपनाया
अपने नए ढंग से सजाया
मेरा नाम बदल कर ससुराल हो गया
फिर मुझे लगा
मैं इन्ही का हूँ ।
पर अब जो मेरी दिवारों के कान
नई बातें सुन रहे हैं
मेरा तो कलेजा ही काँप जाता है
मुझे बेचने की बात हो रही हैं
देखो बेटा ,
तुम्हारे माँ बाप की जवानी की हसरतें ,
तुम्हारी बचपन की शरारतें ,
तुम सब की शादियाँ , फिर तुम्हारे बच्चे ,
इन सब हकीकतों का पत्थराया सबूत हूँ मैं ,
कोई आता है , इससे पहले कि वो बेल बजाता है ,
मेरे सीने पर गढ़ा ये संगमरमरी पत्थर
उसे मेरी पहचान बताता है ।
पर अब समय के साथ ,
तुम्हारे माँ बाप और
उनकी हसरतों के साथ ,
मैं भी बूढ़ा हो चला हूँ ।
अब इस उम्र में मेरे साथ ये मज़ाक न करो ।
न जाने किसके हाथ बेचा जाएगा ,
वो इसे फिर अपने नए ढंग से सजाएगा ,
मेरे सीने पर हथौङा चला ये पत्थर उखाङकर ,
अपने नाम का पत्थर लगवाएगा ।
बेटा,
आज तक तुम्हारे बाप के नाम से ही
अपनी पहचान बताता आया हूँ
इस बूढ़ापे में जबकि मुझे एल्ज़ाइमर हो चला है ,
कोई पुछेगा तो कैसे बताऊँगा , कि
‘‘ये घर किसका है ।’’

October 3, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

‘‘अम्मा चाँद आया क्या’’

शाम से ही ‘जिया’ ने परेशान है किया ,
पहले तो जो मना किया ,
वही नया शऱारा पहन लिया ।
फिर सऱेश़ाम से रट लगाई है ;
‘अम्मा चाँद आया क्या’…………..
मैं तो समझा कर थक गई कि
ये ईद का चाँद है
बङी मुश्किल से होता है इसका दीद़ार ,
देख तू बाहर खेल
मुझे हलक़ान ना कर बेक़ार ।
मैं तो ख़ुद अपने ज़िया से पऱेशान हूँ
वो सुबह से निकलें हैं ,
बाज़ार में इतनी देर लगती है क्या ,
बस यूँ ही हैरान हूँ ।
ना फ़ोन उठाएगें
ना टाईम पर सामान लाऐगें
बच्चे अलग़ पूछ-2 कर
आसमान सर पर उठाऐगें ।
‘अम्मा चाँद आया क्या’…………..
बिटिया ये चाँद रात में नज़र आता है ;
जब आसमाँ सारा तारों से भर जाता है ।
देख , तेरे अब्बा अभी आते ही होंगें ,
तेरे लिए शीर-ख़ुरमा , सेवईयाँ , मालपूए
सब लाते ही होंगें ।
एक़ बार जो ये फ़ोन उठा लें ,
इनका क़ुछ जाता है क्या ;
हिलाल ईद के दिन भी कोई इतनी देर से ,
घर आता है क्या ;
जिया को तो बहला दिया ;
पर इस ‘जिया’ का करूँ मैं क्या ।
‘अम्मा चाँद आया क्या’…………..
‘जिया’ की बच्ची , बोला ना
चाँद आऐगा तो मैं खुद ही तुझे बताऊँगीं
पर अब फ़िर से पूछा ना
तो ज़ोऱ से चपत लगाऊँगीं ।
उफ्फ़ ये टी० वी० पर ब्रेकिंग न्यूज़ क्या है
दिल्ली में चाँदनी चौंक पर बम फटा है
मेरा तो दिल ही बैठा जा रहा है
कहीं घुमते फिरते
उधर तो ना निकल गऐ होंगें ,
फिर कितना भी कहो
कभी बाहर जाकर फ़ोन नहीं करेंगें ।
या अल्लाह ! मेरे बुरे क़ऱमों को नज़रअन्दाज़ करना ,
मेरे उन पर सदा अपना ऱहम बख्शना ।
ईद पर मैं अच्छा ‘फितरा’ भी दुंगीं ।
अब नमाज़ मे कभी भी कोताही ना करूँगी ।
शाम की रोश़नी रात में खोने लगी है
बच्ची अब तो चाँद के लिए रोने लगी है ।
अम्म्म्म्मा , चाँद आया क्या’…………..
सो जा मेरी बच्ची कि मैं जागती हूँ ;
अल्लाह का नज़रे क़रम माँगती हूँ ।
या खुदा इन्तज़ार की ये कैसी रात है ;
मेरे लिए तेरी झोली में क्या सौगात है ।
छत पर खङी हूँ पर नज़रे ग़ली पर हैं
आती जाती हुई हर गाङी पर हैं ।
एक रोश़नी घर की तरफ़ आ रही है
गेट तो पहले ही से खुला छोङा है
हाँ मेरी ‘जिया’ के अब्बू ही हैं ।
एक रोश़नी आसमां में भी छा रही है
सलमा , आज तो राधेश्याम जी ने बचा लिया ।
चाँदनी चौंक जा रहा था कि
नवरात्रे की पूजा के लिए बुला लिया ।
मैंने ‘जिया’ को ज़ोर से पकङ लिया ।
‘अम्मा चाँद आया क्या’…………..
हाँ बिटिया ईद मुबारक बोलो
राधेश्याम चाचा को ।
चाँद आ गया है
तेरा भी और मेरा भी ।

October 3, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

‘‘ वो पुराने चाँदी के ज़ेवर ’’

वो बहुत ही पुराने हैं
बङे ही भारी हैं
इस महगें ज़माने में
लगभग बेदाम हैं
पर मुझे बेहद पसन्द हैं वो
क्योंकि अनमोल हैं
एंटीक हैं
आजकल ऐसे ज़ेवर मिलते कहाँ हैं ।
फिर उनमें कुछ बात है
उन पर टंके ज़वाहरात
वो पुरानी कशीदाकारी
आज के जमाने से बिलकुल अलग
वो नायाब हैं ।
मेरे दिल के बङे ही क़रीब हैं वो
जानती हूँ उनके दामों कुछ न मिलेगा
फिर बिकाउ ही कहाँ हैं वो ।
वो तो बस सहेजने की चीज़ हैं ।
गाहे बगाहे पोटली से निकालो
प्यार भरी नज़र डालो
अन्दर से बाहर से अच्छे से
तबीयत से साफ करो
और सहज ही वापिस रख दो
उनकी उम्र बढ़ती है
वो पुराने चाँदी के ज़ेवर हैं ।
मुझे , आपको , हम सभी को उन्हें
बङे ध्यान से रखना चाहिए ।
इस चोर ज़माने में अकेले छोङने की
चीज़ नहीं हैं वो
और ना ही वृद्धआश्रमों में छोङ आने की ।
‘‘पुराने चाँदी के ज़ेवर हैं वो ।’’

October 3, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

‘‘हम बेटियाँ’’

कोई नीलम है कोई सुनीता है कोई कोमल है
बस सब में एक ही चीज़ कॉमन है ।
वो है मुस्कान ,
जो तुम में भी है
और मुझ में भी है ।
और ये बङी ही स्वभाविक है ।
पर ये बङी अजीब बात है ,
कि मेरा या तुम्हारा होना , ना होना
या तो पुण्य है या पाप है ।
क्यूँ कहा गया कि हम ऋणी हो जाए ।
सिर्फ इसलिए कि हम जन्मे गए ।
क्यूँ हमारा जन्म सिर्फ तभी सार्थक होगा
जब हम कुछ बन जाएँगी , लङको की बनिस्बत
जाइए हम नहीं मानते कोई ऋण ।
पर रूकिए ,
ये हमसे होगा ही नही
ये हमारा स्वभाव ही नही
हम तो फिर कोशिश करेगें
वो सब कुछ बनने की जो आप चाहते हैं
गर ना बन सके सानिया , कल्पना या किरण बेदी
रह जाए सिर्फ नीलम , सुनीता या कोमल बन कर
फिर भी वो तो बनेंगीं ही
जो लङके कभी नही बन पाएगें ।
एक बहुत ही प्यारी माँ , बहुत ही sweet बहने
और आगे आगे तो इकलौती बेटियाँ भी ।

October 3, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

‘‘मैंआपकी हिन्दी बिटिया”

मैं छोटी थी
थोड़ी चंचल थी
कुछ अल्हड़ थी
पर निरंकुश थी और निर्भय भी
बृजभाषा थी सहेली मेरी
बड़ी खड़ी खड़ी थी बोली मेरी
वो काल बड़ा ही मस्त था ।
मुझ पर सबका वरदहस्त था ।
थे सूरदास , कबीर संग
फिर आए शरतचंद्र और प्रेमचंद्र
इनके संग खेल कर बड़ी हुई ।
बच्ची थी मैं थोड़ी बड़ी हुई ।
अब आया कुछ बदलाव मुझमें ……..
नयी आशा हूँ अभिलाषा हूँ
मातृभाषा हूँ राष्ट्रभाषा हूँ ।
मुझे लगा मैं हूँ सर्वसम्पन्न
यहाँ कौन है जो करे मेरा आलिंगन
सब बुनते हैं उन्होने भी बुना
बड़ा सोच समझ कर मेरा वर चुना ।
मैं ब्याही गई अंग्रेजी संग
भरी मन में फिर एक नयी उमंग ।
पर ससुराल भी क्या अजुबा था
वहाँ का रंग ढंग ही अनुठा था ।
आदर का कहूँ क्या हाल था
शब्दों का अजीब मायाजाल था ।
अब तु भी YOU
और आप भी YOU
मुझे बात बात पर कहें
WHO ARE YOU ?
सब सहते हैं मैंने भी सहा
ससुराल को ही अपना घर कहा
पर अंग्रेजी मुझ पर यूँ हावी हुई
लगती थी मुझ पर छाई हुई
पर धीरे धीरे हद होने लगी
मेरी पहचान ही खोने लगी
अब हाल मैं अपना किस से कहूँ ।
डर लगता है कल रहूँ ना रहूँ ।
पर बेटी को क्या यूँ मर जाने दोगे ।
अपनी पूत्री की क्या सुध भी ना लोगे ।
मेरे स्वाभिमान ने मुझको पुकारा है ।
और आप लोगों का भी तो सहारा है ।
इससे पहले कि अंग्रेजी मुझे लगाए आग ।
बोलिए आप देगें ना मेरा साथ ।
धन्यवाद ।
आपकी बिटिया,
हिन्दी ।

September 26, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | 1 Comment

KITNA SOOKOON HAI.

कभी-2 यूँ ही सुबह जल्दी उठ कर सूरज को ताकने में ,

या फिर सबसे देर तक सो कर उठने में और इधर-उधर बगले झाकने में

कभी-2 प्यार से अपने कुत्ते के सिर पर हाथ फिराने में ,

या फिर कभी उसी जैसा मुँह बना कर उसी पर गुर्राने में

कभी-2 अपनी ही सूरत आइने में देख कर उस पर इतराने में ,

या फिर कभी उसी चेहरे को देख कर उसे डाँट लगाने में

कभी रस पीती तितली को पास से देखने के चक्कर में उङाने में ,

और फिर हाथों के पर बना कर उन्हे हौले-2 हिलाने में

कभी प्यारे से बच्चे के गालों को पकङ कर जोर से हिलाने में ,

या फिर किसी बुढ़ी अम्मा की झुर्रियों पर धीरे से हाथ फिराने में

बच्चे को स्कूल भेज कर एक मिनट सुस्ताने में ,

कभी पति को हिला-2 कर बनावटी गुस्से से जगाने में

कभी-2 शावर के नीचे देर तक नहाने में ,

और कभी तैयार-वैयार सब जल्दी से निपटाने में

कभी-2 कोई गलत बात ठीक ढंग समझाने में ,

और कभी कोई ठीक बात लाख समझ आने में

कभी-2 सब्जी के भाव अपने हिसाब से ठीक कराने में ,

और कभी कोई महंगी चीज बिना रेट पुछे ले आने में

कभी-2 ससुराल की सारी बातें मम्मी को बताने में ,

और कभी ससुराल में अपने मायके की शान दिखाने में

कभी-2 युँ ही सासु माँ के पैर दबाने में ,

और कभी खुद को ज्यादा ही व्यस्त दिखाने में

कभी-2 पति के आने से पहले गेट खोल बाहर जाने में ,

और कभी उठ कर जाना लाख हार्न बजाने में

कभी-2 कपड़ों की अलमारी को ठीक तरह लगाने में ,

और कभी सारे कपड़ों को बस यूँ ही बिखराने में

कभी भूल से दुकान वाले से ज्यादा पैसे ले आने में ,

कभी गरीब समझ रिक्शे वाले को दो रूपये फालतु दे आने में

कभी-2 दूध वाले को पानी पर झिड़क लगाने में ,

और कभी धो कर पतीला दूध में थोड़ा पानी और मिलाने में

कभी-2 नुक्कड़ की रेहड़ी से गोल गप्पे का आने में ,

और कभी महंगे से होटल से खाना घर पर मंगवाने में

कभी-2 शादी में जा कर तीन चार आईसक्रीम खा जाने में ,

और कभी मना करना बच्चों को एक भी आईसक्रीम दिलाने में

कभी-2 बच्चों को पोयम मेहमानों को सुनवाने में ,

और कभी अपने कुत्ते के खेल उन्हे दिखाने में

कभी-2 शकिल से तनख्वाह का एक एक पैसा बचाने में ,

और कभी बारात में रूपये उड़ा कर लुटाने में

कभी छोटे से बच्चे को प्यार से दूध पिलाने में ,

कभी फिर करना जतन उसकी बोतल छुड़ाने में

कभी डपट कर पतिदेव योगा शुरू कराने में ,

और फिर कभी मार कर ताने बाहर खाना खिलाने में

कभी-2 कैसे भी पंडित को अपना हाथ दिखाने में ,

और कभी किसी और के हाथ में वैसी ही बातें बताने में

कभी सोने के समय बच्चे को लम्बी कहानी सुनाने में ,

और कभी कितना बोलता है की शिकायत उसके पापा से लगाने में

कभी प्यारी सी फ्रिल की फ्राक अपनी बेटी को पहनाने में ,

और कभी ड्रैस के नाम पर बड़ी हो गई हो जताने में

कभी-2 बढ़िया सी डिश बना पड़ोसियों को खिलाने में ,

और कभी नौकर को भेज वहाँ से थोड़ी सब्जी मंगाने में

कभी-2 दफ्तर में झुठी चिट्ठी भिजवाने में ,

और कभी पकड़े जाने पर पुराना बहाना बनाने में

कभी पुरानी सहेली को याद करके फोन मिलाने में ,

और कभी पकाउ सहेली को फोन पर टरकाने में

कभी-2 नौकर के बच्चों को फल मिठाईयाँ दिलाने में ,

और कभी नौकर से थोड़ा ज्यादा काम कराने में

कभी-2 अपने भावों को कविता में दर्शाने में ,

और कभी अपने भावों को बस कविता है कह कर छुपाने में

कभी-2 बड़ी बड़ी बातों को छोटी सी बात कह कर उड़ाने में ,

और कभी छोटी सी बात का राई का पहाड़ बनाने में

कभी धोबी के हिसाब में उसकी गलती पकड़ाने में ,

और कभी अपने हिसाब की गलती पर पछताने में

कभी बड़ी होती बेटी को रोटी पकाना सिखाने में ,

और कभी बस पढ़ लो कह कर उससे काम छुड़ाने में

कभी-2 बड़े मनोयोग से बच्चे का प्रोजक्ट पूरा करवाने में ,

और कभी होमवर्क कर लो कह कर चादर ओढ़ सो जाने में

कभी-2 आसमान में पतंग उड़ा कर पेंचें लड़वाने में ,

और कभी बारिश के पानी में काग़ज़ की नाव तैराने में

कभी दाना डाल कर छत पर चिड़ियों को बुलाने में ,

कभी बन्दरो को हुड़-हुड़ कर छत से दूर भगाने में

……..क्रमशः………

September 25, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

‘‘सपना मेरा’’

बहुत दिनों से मेरी आखों ने कोई सपना नया नहीं बुना !
कुछ देर को बन्द हैं ये, जैसे कि लेती हैं सांस,
फिर देखेगीं नया सपना, बांधेगी नयी आस !
बनेगा या बिखरेगा वो सपना मेरा !
बस इसमें इक ही चीज जरुरी है साथ तेरा,
टूटॅगा तो दूंगी हथेली पर तेरी आंसु कुछ,
संवरेगा तो होऊगी तेरे होठों में मै भी खुश !
रोंऊगी तो लग जाऊंगी गले से तेरे !
खुश होऊंगी तो लग जाऊंगी गले से तेरे !
गोया कि मेरा हर जश्न हैं बाजुऍ तेरी,
गोया कि मेरा हर अश्क हैं बाजुऍ तेरी !
मैनें तो देख अपने दिल का पूरा हाल लिखा,
अब तु इतना तो कर, इक सपना तो दिखा…… !

July 6, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

SOOKOON-E-ROOH

तेरे दर्दे दिल की दवा हूँ मैं, आ मुझ पे एतबार कर,
बता मुझे क्या गुजर गया, ना मुझ से कोई सवाल कर,
आ करीब आ, मुझ में समां,
बस सुकून-ए-रूह की तलाश कर!

July 5, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet

BAHUT NEEND AA RAHI HAI.

आज मेरे होटों पे बिन बात हसीं आई है ,
तेरी सोए हुई पलकों में कोई ख्वाब है शायद !
बस अब ज़ोर से नींद आ रही है,
अगली लाइन लिखने से पहले सो जाउंगी शायद!

July 5, 2008 Posted by poonamparinita | HINDI POETRY | | No Comments Yet